शांति पर्व · अध्याय 42
कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
अब तक की कहानी
गांधारी ने श्रीकृष्ण को यदुवंश के नाश का शाप दिया। अब सभी गंगा के तट पर मृतकों को जल-अंजलि देने पहुँचे।
गंगा के किनारे सब अपने-अपने प्रियजनों को दे रहे थे। तभी कुंती रोते हुए बोलीं, 'पुत्रो, कर्ण के लिए भी जल दो। वह तुम्हारा सबसे बड़ा भाई था — मेरा पहला पुत्र, सूर्य देव का अंश।' यह सुनकर पांडव सन्न रह गए।
युधिष्ठिर फूट-फूटकर रो पड़े। 'माँ, आपने यह बात छिपाकर रखी? जिस भाई के आगे हम झुक जाते, उसे हमने मार डाला। उसकी वाणी मुझे सदा माँ जैसी क्यों लगती थी, अब समझा।' उन्होंने स्वयं कर्ण का तर्पण किया।
इस दुःख ने युधिष्ठिर को भीतर से तोड़ दिया। उन्होंने कहा, 'इतने अपनों को मारकर मिला राज्य मुझे नहीं चाहिए। मैं वन जाकर लूँगा।' नारद मुनि ने उन्हें कर्ण के जीवन की कथा सुनाई और समझाया कि कर्ण अपने ही कर्मों और शापों से बंधे थे।
भाइयों ने अलग-अलग तरह से समझाया। अर्जुन ने कहा, 'राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा है, भागना नहीं।' भीम, नकुल, सहदेव और द्रौपदी ने भी विनती की। व्यास जी और श्रीकृष्ण ने कहा, 'जो बीत गया, उस पर शोक करने से प्रजा का भला नहीं होगा। अब अपना धर्म निभाओ।'
अंत में युधिष्ठिर मान गए। हस्तिनापुर में उनका राज्याभिषेक हुआ। उन्होंने भीम को युवराज बनाया, विदुर को सलाहकार, और सबसे पहले यह आदेश दिया कि राजा धृतराष्ट्र का सम्मान पहले की तरह हो — 'जो मेरा भला चाहता है, वह उनकी सेवा करे।'
आज के जीवन में सीख
दुःख से भागना आसान है, उसके साथ खड़े होकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाना कठिन। पर लोग उसी पर टिके होते हैं।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर