उद्योग पर्व · अध्याय 25
श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
अब तक की कहानी
अर्जुन ने श्रीकृष्ण को और दुर्योधन ने नारायणी सेना को चुना है। युद्ध से पहले एक आख़िरी कोशिश बाक़ी है।
युधिष्ठिर युद्ध नहीं चाहते थे। उन्होंने कहा, 'अपनों का ख़ून बहाकर मिला राज्य मुझे नहीं चाहिए। हमें केवल पाँच गाँव दे दें, हम संतोष कर लेंगे।' श्रीकृष्ण ने कहा, 'मैं स्वयं बनकर हस्तिनापुर जाऊँगा और शांति का अंतिम प्रयास करूँगा।' द्रौपदी ने अपने खुले बाल दिखाकर याद दिलाया कि उनका अपमान अभी भूला नहीं गया है।
श्रीकृष्ण हस्तिनापुर पहुँचे। दुर्योधन ने उनके लिए शानदार भोज और महल तैयार किया था, पर श्रीकृष्ण ने उसे ठुकरा दिया। उन्होंने कहा, 'भोजन या तो प्रेम से किया जाता है, या मजबूरी में। तुम्हारे मन में प्रेम नहीं, और मेरी कोई मजबूरी नहीं।' वे विदुर के सादे घर में ठहरे और वहीं प्रेम से भोजन किया।
अगले दिन राजसभा में श्रीकृष्ण ने बहुत शांति और विनम्रता से कहा, 'यह कुल एक है। युद्ध हुआ तो दोनों ओर का विनाश होगा। पांडवों को उनका हक़ दो, या कम से कम पाँच गाँव दे दो।' भीष्म, द्रोण, विदुर, यहाँ तक कि धृतराष्ट्र और गांधारी ने भी दुर्योधन को समझाया। पर दुर्योधन अड़ा रहा, 'बिना युद्ध के मैं जितनी ज़मीन भी नहीं दूँगा।'
इतना ही नहीं, दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बंदी बनाने की योजना बनाई। श्रीकृष्ण यह जानकर हँसे। उन्होंने सभा में अपना प्रकट किया। उनके शरीर में देवता, ऋषि, सारे लोक और पांडव-यादव वीर दिखाई देने लगे। पूरी सभा चकाचौंध हो गई और कई लोगों ने आँखें बंद कर लीं। केवल भीष्म, द्रोण, विदुर और कुछ ऋषि उस दिव्य रूप को देख सके।
धृतराष्ट्र ने प्रार्थना की, और श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें कुछ पल के लिए दृष्टि मिली, ताकि वे इस रूप के दर्शन कर सकें। फिर श्रीकृष्ण ने वह रूप समेट लिया और सभा से चल पड़े। शांति का अंतिम दरवाज़ा बंद हो चुका था। अब युद्ध निश्चित था।
आज के जीवन में सीख
समझदार इंसान लड़ाई से पहले हर शांतिपूर्ण रास्ता आज़माता है। पर जो अहंकार में सबकी सलाह ठुकरा दे, वह अपने ही विनाश का रास्ता चुनता है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर