शांति और अनुशासन पर्व · अध्याय 43

बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बन गए, पर उनका मन अब भी अशांत था। पितामह भीष्म बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, 'भीष्म के साथ जो ज्ञान है, वह उनके जाने के बाद संसार से चला जाएगा। चलो, उनसे राजधर्म सीखो।' सब पांडव कुरुक्षेत्र पहुँचे, जहाँ भीष्म अब भी बाणों पर लेटे थे।

भीष्म ने कहा, 'केशव, आप स्वयं ज्ञान के सागर हैं, फिर मुझसे क्यों? और इन घावों की पीड़ा में मेरा मन भी साफ़ नहीं।' श्रीकृष्ण ने उनकी पीड़ा और थकान दूर कर दी और कहा, 'मैं चाहता हूँ कि आपकी कीर्ति सदा बनी रहे। आपके वचन संसार के लिए वेद के समान होंगे।'

फिर कई दिनों तक भीष्म बोलते रहे और युधिष्ठिर सुनते रहे। राजा का पहला धर्म प्रजा की रक्षा और उसे सुखी रखना है। सत्य, दया, क्षमा और परिश्रम राजा के गहने हैं। संकट के समय कैसे जिएँ — यह समझाया। और अंत में मोक्ष का मार्ग — मन को शांत करके ईश्वर में लगाना।

एक दिन युधिष्ठिर ने पूछा, 'संसार में सबसे बड़ा देवता कौन है? किसकी स्तुति करके मनुष्य का कल्याण होता है?' भीष्म ने श्रीकृष्ण की ओर संकेत किया और भगवान विष्णु के हज़ार नामों का स्तोत्र सुनाया — जिसे आज हम के नाम से जानते हैं।

भीष्म के ये उपदेश महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में संकलित हैं। एक योद्धा, जिसने पूरा जीवन तलवार से बिताया, अपने अंतिम दिनों में शिक्षक बन गया — और उसके शब्द आज भी पढ़े जाते हैं।

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः। भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥

वे ही यह विश्व हैं, सर्वव्यापी विष्णु हैं, यज्ञ के स्वामी हैं, भूत-भविष्य-वर्तमान के प्रभु हैं; वे ही सब प्राणियों को रचते, पालते, उनमें बसते और उन्हें आगे बढ़ाते हैं।

— विष्णु सहस्रनाम, पहला नाम-श्लोक (अनुशासन पर्व)

आज के जीवन में सीख

ज्ञान तभी पूरा होता है जब उसे आगे बाँटा जाए। बड़ों के अनुभव से सीखने का समय निकालें — वह किताबों में नहीं मिलता।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटउत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग

सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
  6. 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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