द्रोण पर्व · अध्याय 33
घटोत्कच का बलिदान
अब तक की कहानी
अर्जुन ने जयद्रथ का वध करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। क्रोधित कौरवों ने सूर्यास्त के बाद भी युद्ध जारी रखा।
चौदहवें दिन की रात युद्ध रुका नहीं। मशालों की रोशनी में लड़ाई चलती रही। अँधेरे में सबसे शक्तिशाली थे भीम और हिडिंबा के पुत्र — राक्षस कुल के, जिनकी शक्ति रात में और बढ़ जाती थी।
घटोत्कच आकाश में उड़ते, ग़ायब हो जाते, फिर अचानक प्रकट होकर पत्थरों और हथियारों की बारिश करते। कौरव सेना में भगदड़ मच गई। सैनिक चिल्लाने लगे, 'कर्ण, इसे रोको, वरना आज रात ही सब ख़त्म हो जाएगा!'
कर्ण के पास इंद्र की दी हुई वह थी, जो केवल एक बार चल सकती थी। उसे उन्होंने अर्जुन के लिए बचाकर रखा था। पर दुर्योधन और सबकी विनती पर, मजबूरी में, कर्ण ने वह शक्ति घटोत्कच पर चला दी।
शक्ति घटोत्कच के हृदय में लगी। पर गिरते-गिरते भी उन्होंने अपनी सेवा पूरी की — उन्होंने अपना शरीर पहाड़ जितना बड़ा कर लिया और कौरव सेना की एक बड़ी टुकड़ी पर गिरे। पांडव शिविर में शोक छा गया; भीम फूट-फूटकर रोए।
पर उसी समय श्रीकृष्ण के चेहरे पर संतोष था। अर्जुन ने हैरान होकर पूछा तो वे बोले, 'वह शक्ति अर्जुन के लिए थी। आज घटोत्कच ने अपने प्राण देकर तुम्हें बचा लिया है।' सबने समझा कि घटोत्कच का बलिदान कितना बड़ा था।
आज के जीवन में सीख
कुछ लोग पर्दे के पीछे रहकर सबसे बड़ा त्याग करते हैं। उन्हें पहचानना और याद रखना हमारा कर्तव्य है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर