सभा पर्व · अध्याय 18
वनवास की शुरुआत
अब तक की कहानी
द्रौपदी की लाज बची और धृतराष्ट्र के वरदान से पांडव मुक्त होकर अपना राज्य लेकर लौटने लगे।
पांडव अभी रास्ते में ही थे कि दुर्योधन ने पिता को फिर भड़काया, 'पांडव अपमान का बदला ज़रूर लेंगे।' धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को एक बार फिर खेलने बुलाया। इस बार शर्त थी — जो हारेगा, वह बारह वर्ष वन में रहेगा और तेरहवाँ वर्ष में बिताएगा। यदि उस साल पहचाना गया, तो फिर से बारह वर्ष का वनवास।
सबने युधिष्ठिर को रोका, पर वे फिर खेलने बैठ गए, और फिर हार गए। पांडवों ने राजसी वस्त्र उतारकर पहन लिए। दुःशासन ने उनका मज़ाक़ उड़ाया। वृद्ध कुंती विदुर के घर रहीं, क्योंकि वे वन का कष्ट सहने लायक नहीं थीं। विदा के समय सबकी आँखें भीगी थीं।
चलते समय हर भाई ने अपना संकल्प दोहराया। भीम ने कहा कि वे दुर्योधन की जाँघ तोड़ेंगे। अर्जुन ने कहा कि वे कर्ण को युद्ध में मारेंगे। सहदेव ने शकुनि को और नकुल ने उसके साथियों को मारने की प्रतिज्ञा की। द्रौपदी ने अपने खुले बाल नहीं बाँधे — उन्होंने कहा कि वे इन्हें तभी बाँधेंगी जब अपमान का बदला पूरा होगा।
हस्तिनापुर की प्रजा रोती हुई उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। साथ में बहुत से ब्राह्मण भी आए। युधिष्ठिर चिंता में थे कि इतने लोगों को वन में भोजन कैसे देंगे। तब धौम्य के कहने पर उन्होंने सूर्य देव की आराधना की। सूर्य देव प्रसन्न हुए और उन्हें एक ताँबे का अक्षय पात्र दिया — जब तक द्रौपदी भोजन न कर लें, उससे अन्न कभी ख़त्म नहीं होता था।
काम्यक वन में श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने आए। द्रौपदी ने रोते हुए उन्हें सभा का पूरा अपमान सुनाया। श्रीकृष्ण ने कहा, 'मैं उस समय द्वारका में नहीं था, वरना यह जुआ होने ही न देता। पर कृष्णा, मैं वचन देता हूँ — जिन्होंने तुम्हें रुलाया है, उनकी स्त्रियाँ भी एक दिन रोएँगी। धरती फट जाए, पर मेरा वचन नहीं टलेगा।' और इस प्रकार बारह वर्षों का लंबा वनवास शुरू हुआ।
आज के जीवन में सीख
एक ही गलती दो बार दोहराना सबसे महँगा पड़ता है। पर कठिन समय में भी जो धैर्य और भरोसा नहीं छोड़ता, उसके लिए रास्ते खुलते जाते हैं।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर