आदि पर्व · अध्याय 10
रंगभूमि में कर्ण
अब तक की कहानी
राजकुमारों की शिक्षा पूरी हो चुकी है। अर्जुन द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय शिष्य बन गए हैं।
द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर में एक बड़ा उत्सव रखा, ताकि प्रजा राजकुमारों का कौशल देख सके। सजाई गई। भीष्म, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती और हज़ारों लोग वहाँ आए। भीम और दुर्योधन ने गदा का कौशल दिखाया। फिर अर्जुन आए। उन्होंने आग, जल, वायु और बादलों के दिव्य अस्त्र चलाए। पूरी सभा तालियों से गूँज उठी।
तभी द्वार पर बादल की गर्जना जैसी आवाज़ हुई। एक तेजस्वी युवक भीतर आया — कानों में कुंडल, शरीर पर चमकता कवच। वह कर्ण था। उसने कहा, 'अर्जुन ने जो कुछ किया, वह सब मैं भी करके दिखाऊँगा।' और उसने सचमुच वह सब कर दिखाया। दुर्योधन खुशी से उठा और उसे गले लगा लिया। फिर कर्ण ने अर्जुन को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारा।
युद्ध शुरू होने से पहले कृपाचार्य बोले, 'अर्जुन कुंती के पुत्र और कुरुवंश के राजकुमार हैं। तुम कौन हो, किसके पुत्र हो? राजकुमार केवल बराबर वालों से लड़ते हैं।' यह सुनकर कर्ण का सिर झुक गया। उसके पास कोई उत्तर नहीं था।
तब दुर्योधन ने कहा, 'यदि अर्जुन केवल राजा से लड़ेंगे, तो मैं अभी कर्ण को अंग देश का राजा बनाता हूँ।' उसी क्षण कर्ण का हुआ। कर्ण ने भावुक होकर पूछा, 'इसके बदले मैं क्या दूँ?' दुर्योधन ने कहा, 'बस तुम्हारी मित्रता।' कर्ण ने उसी दिन जीवन भर की मित्रता का वचन दे दिया।
तभी बूढ़े सारथी अधिरथ काँपते हुए आए। राजा बनने के बाद भी कर्ण ने धनुष रखकर पिता के चरण छुए। भीम ने ताना मारा, 'सारथी का बेटा है, जा, चाबुक पकड़!' सूरज ढल गया और उत्सव समाप्त हुआ। उस भीड़ में केवल कुंती ने कवच-कुंडल देखकर अपने पहले बेटे को पहचाना था — और वे मूर्छित हो गई थीं।
आज के जीवन में सीख
किसी की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके गुणों से होनी चाहिए। और जो मुश्किल वक़्त में साथ दे, उसका एहसान इंसान कभी नहीं भूलता।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर