स्त्री पर्व · अध्याय 41

गांधारी का शोक और शाप

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

युद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों में लाखों योद्धा मारे गए। अब जीवित बचे लोगों को उस विनाश का सामना करना था।

पांडव श्रीकृष्ण के साथ अंधे राजा धृतराष्ट्र से मिलने गए। धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने की इच्छा जताई। श्रीकृष्ण समझ गए कि सौ पुत्रों के शोक में राजा के मन में क्रोध है, इसलिए उन्होंने भीम की जगह लोहे की एक मूर्ति आगे कर दी। धृतराष्ट्र ने उसे इतनी ज़ोर से दबाया कि वह चूर-चूर हो गई। फिर वे पछताकर रो पड़े।

अब बारी गांधारी की थी, जिन्होंने पति के लिए जीवन भर आँखों पर पट्टी बाँधी थी। वे पांडवों को शाप देने वाली थीं, तभी व्यास जी ने उन्हें याद दिलाया कि युद्ध के दिनों में वे दुर्योधन से हर रोज़ यही कहती थीं — 'जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।' गांधारी का क्रोध कुछ शांत हुआ।

युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, 'माँ, आपके पुत्रों का हत्यारा मैं हूँ। मुझे शाप दीजिए।' गांधारी की नज़र पट्टी के नीचे से युधिष्ठिर के पैर के अँगूठे पर पड़ी, और वह नाख़ून काला पड़ गया। यह देखकर अर्जुन डरकर श्रीकृष्ण के पीछे छिप गए। धीरे-धीरे गांधारी ने पांडवों को माँ की तरह सांत्वना दी।

फिर व्यास जी की दी हुई से गांधारी ने पूरी युद्धभूमि देखी — विलाप करती विधवाएँ, बेटों को ढूँढ़ती माँएँ, गिद्ध और गीदड़। अपने सौ पुत्रों के शव देखकर उनका धैर्य टूट गया। उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा, 'तुम चाहते तो यह युद्ध रोक सकते थे।'

गांधारी ने शाप दिया, 'आज से छत्तीस वर्ष बाद तुम्हारा भी आपस में लड़कर नष्ट हो जाएगा, और तुम वन में अकेले साधारण मृत्यु पाओगे।' श्रीकृष्ण ने शांत भाव से मुस्कुराकर कहा, 'माता, मैं यह जानता था। यादवों का अंत होना ही है। आपने मेरा काम आसान कर दिया।'

यतो धर्मस्ततो जयः

जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

— महाभारत — गांधारी का दुर्योधन को आशीर्वाद

आज के जीवन में सीख

दुःख में भी सच को पहचानना बड़ी बात है। गांधारी ने बेटे के मोह के बावजूद उसे विजय नहीं, धर्म का आशीर्वाद दिया।

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सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
  6. 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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