स्वर्गारोहण पर्व · अध्याय 52
स्वर्ग में युधिष्ठिर
अब तक की कहानी
अपने भक्त कुत्ते को न छोड़कर युधिष्ठिर ने धर्म की अंतिम परीक्षा पास की और इंद्र के रथ से सशरीर स्वर्ग पहुँचे।
स्वर्ग पहुँचकर युधिष्ठिर ने चारों ओर देखा। वहाँ सिंहासन पर, तेज से चमकता हुआ, दुर्योधन बैठा था। युधिष्ठिर क्रोध से भर गए — 'जिसके कारण इतने लोग मरे, जिसने द्रौपदी का अपमान किया, वह यहाँ? मैं यहाँ नहीं रहूँगा। मुझे वहाँ ले चलो जहाँ मेरे भाई हैं।' नारद ने समझाया, 'उसने युद्धभूमि में वीर की तरह प्राण दिए हैं। अब बैर छोड़िए।'
एक देवदूत युधिष्ठिर को भाइयों से मिलाने ले चला। रास्ता अँधेरा, दुर्गंध और भयानक दृश्यों से भरा था। युधिष्ठिर लौटने लगे, तभी चारों ओर से दुखी आवाज़ें आईं — 'धर्मराज, रुकिए! आपके यहाँ होने से हमारी पीड़ा कम होती है।' पूछने पर पता चला कि वे कर्ण, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी हैं।
युधिष्ठिर ने देवदूत से कहा, 'जाओ, देवताओं से कह दो — मैं यहीं अपने भाइयों के साथ रहूँगा।' तभी इंद्र और धर्मराज प्रकट हुए। अँधेरा छँट गया, नरक का दृश्य ग़ायब हो गया। इंद्र बोले, 'यह सब थी। द्रोण से आधा सच बोलने के कारण आपको भी नरक का एक क्षण देखना था। आपके भाई भी इसी तरह कुछ समय के लिए यहाँ थे।'
युधिष्ठिर ने स्वर्ग की गंगा में स्नान किया और उनका मानव शरीर छूट गया। उन्होंने दिव्य रूप पाया और सबसे मिले — श्रीकृष्ण अपने दिव्य रूप में थे और अर्जुन उनकी सेवा में; कर्ण सूर्य के तेज के साथ; भीम वायु देव के साथ; द्रौपदी लक्ष्मी के रूप में; भीष्म वसुओं के बीच; द्रोण बृहस्पति के पास। अब किसी के मन में कोई बैर नहीं था।
इस प्रकार महाभारत की कथा पूरी होती है। अंत में व्यास जी दोनों हाथ उठाकर कहते हैं कि धर्म से ही अर्थ और काम मिलते हैं, फिर भी लोग धर्म क्यों नहीं अपनाते? यही इस महान ग्रंथ का अंतिम संदेश है — जीवन की हर लड़ाई के बाद भी, धर्म ही बचता है।
ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते॥
मैं दोनों भुजाएँ उठाकर पुकार रहा हूँ, पर कोई मेरी नहीं सुनता। धर्म से ही अर्थ और काम मिलते हैं, तो फिर लोग धर्म का पालन क्यों नहीं करते?
— महाभारत, स्वर्गारोहण पर्व — भारत सावित्री
आज के जीवन में सीख
मन में बैर लेकर कोई सच्ची शांति नहीं पा सकता। अपनों के साथ खड़े रहना और क्षमा करना ही असली स्वर्ग है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर