आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 48
बड़ों का वन-गमन
अब तक की कहानी
युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ पूरा हुआ। वे धर्म से राज कर रहे थे और धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा अपने माता-पिता की तरह करते थे।
पंद्रह वर्ष बीत गए। युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र को कभी कोई कमी नहीं होने दी, पर भीम के मन में पुराने घाव थे और वे कभी-कभी चुभती बातें कह देते। धृतराष्ट्र को लगा कि अब संसार छोड़ने का समय है। उन्होंने युधिष्ठिर से वन जाकर तप करने की अनुमति माँगी। युधिष्ठिर बहुत दुखी हुए, पर व्यास जी के समझाने पर मान गए।
धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ विदुर, संजय और — सबको चौंकाते हुए — माता कुंती भी चल पड़ीं। पांडवों ने रोकर उन्हें रोकना चाहा। कुंती बोलीं, 'मैंने तुम्हें युद्ध के लिए इसलिए नहीं उकसाया था कि मैं राजमहल का सुख भोगूँ। मैं चाहती थी कि तुम अपमान में न जियो और अपना धर्म निभाओ। अब मेरा धर्म है।'
कुछ समय बाद पांडव उनसे मिलने वन गए। वहाँ उन्होंने विदुर को देखा — तप से अत्यंत दुबले। विदुर ने युधिष्ठिर को एकटक देखा और योग से अपने प्राण युधिष्ठिर में समा दिए। परंपरा में दोनों को धर्म का अंश माना जाता है।
उसी समय व्यास जी आए और गांधारी के अनुरोध पर एक अद्भुत रात दिखाई। उन्होंने सबको गंगा तट पर बुलाया। रात में गंगा के जल से युद्ध में मारे गए सारे योद्धा — भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुर्योधन, अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र — बिना किसी बैर के, दिव्य रूप में प्रकट हुए। माँओं ने बेटों से, पत्नियों ने पतियों से मिलकर एक रात बिताई। भोर होते ही सब फिर लौट गए।
दो वर्ष बाद नारद मुनि हस्तिनापुर आए और दुखद समाचार दिया। वन में भयंकर आग लगी थी। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती भागे नहीं — वे में बैठे रहे और शांति से उसी आग में देह त्याग दी। संजय हिमालय की ओर चले गए। युधिष्ठिर ने गंगा तट पर उनके लिए तर्पण किया।
आज के जीवन में सीख
जीवन के हर पड़ाव का अपना धर्म है। समय पर ज़िम्मेदारियाँ छोड़कर आगे बढ़ना भी उतना ही बड़ा साहस है, जितना उन्हें निभाना।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर