वन पर्व · अध्याय 21

यक्ष प्रश्न

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

वनवास के बारह वर्ष लगभग पूरे होने को हैं। अर्जुन दिव्य अस्त्र लेकर लौट आए हैं, और कर्ण ने अपने कवच-कुंडल इंद्र को दान कर दिए हैं।

एक दिन एक ब्राह्मण दौड़ता हुआ आया और बोला, 'एक हिरण मेरी अपने सींगों में फँसाकर भाग गया है। उसके बिना मैं यज्ञ की अग्नि नहीं जला सकता।' पाँचों भाई हिरण के पीछे दौड़े, पर वह हाथ नहीं आया। थककर वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए। सबको ज़ोर की प्यास लगी थी। युधिष्ठिर ने नकुल को पानी ढूँढ़ने भेजा।

नकुल को एक साफ़ झील मिली। जैसे ही वे पानी पीने झुके, एक आवाज़ आई, 'रुको! यह झील मेरी है। पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर पानी पीना।' प्यासे नकुल ने बात नहीं मानी, पानी पिया और वहीं गिरकर मर गए। फिर सहदेव, अर्जुन और भीम एक-एक कर आए, और सबके साथ यही हुआ। अर्जुन ने तो आवाज़ पर बाण भी चलाए।

अंत में युधिष्ठिर स्वयं आए। चारों भाइयों को मरा देखकर वे दुख से काँप उठे। तभी आवाज़ आई — एक विशाल पेड़ पर बैठा था। युधिष्ठिर ने विनम्रता से कहा, 'मैं आपकी चीज़ बिना पूछे नहीं लूँगा। पूछिए अपने प्रश्न।' यक्ष ने एक के बाद एक बहुत से प्रश्न पूछे।

यक्ष ने पूछा, 'हवा से भी तेज़ क्या है?' युधिष्ठिर बोले, 'मन।' 'घास से भी अधिक क्या है?' 'मनुष्य की चिंताएँ।' 'धरती से भारी क्या है?' 'माता।' 'आकाश से ऊँचा कौन?' 'पिता।' 'संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?' युधिष्ठिर बोले, 'हर दिन प्राणी मृत्यु की ओर जाते हैं, फिर भी बचे हुए लोग ऐसे जीते हैं जैसे वे सदा रहेंगे। इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा?'

यक्ष प्रसन्न हुआ और बोला, 'मैं तुम्हारे एक भाई को जीवित कर सकता हूँ। किसे चुनोगे?' युधिष्ठिर ने कहा, 'नकुल को।' यक्ष चकित हुआ, 'भीम और अर्जुन जैसे वीरों को छोड़कर?' युधिष्ठिर बोले, 'मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं। कुंती का एक पुत्र मैं जीवित हूँ, तो माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए।' यह सुनकर यक्ष ने असली रूप दिखाया — वे स्वयं धर्मराज थे, युधिष्ठिर के पिता। उन्होंने चारों भाइयों को जीवित किया और वर दिया कि अज्ञातवास में कोई उन्हें पहचान नहीं पाएगा।

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥

हर दिन प्राणी यमलोक को जाते हैं, फिर भी बचे हुए लोग सदा जीने की इच्छा रखते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य क्या है?

— महाभारत, वन पर्व (यक्ष प्रश्न)

आज के जीवन में सीख

सच्चा न्याय वह है जो अपने फ़ायदे से ऊपर उठकर सबके साथ बराबरी करे। और प्यास कितनी भी हो, सोच-समझकर क़दम उठाना ही बचाता है।

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सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
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  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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