आदि पर्व · अध्याय 9
एकलव्य की गुरुभक्ति
अब तक की कहानी
द्रोणाचार्य हस्तिनापुर में राजकुमारों को शस्त्र-विद्या सिखा रहे हैं। उन्होंने अर्जुन से वादा किया है कि उसे संसार का श्रेष्ठ धनुर्धर बनाएँगे।
एक दिन निषादों के राजा हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोणाचार्य के पास आया। उसने हाथ जोड़कर कहा, 'गुरुदेव, मुझे धनुर्विद्या सिखाइए।' द्रोण की पाठशाला केवल कुरु राजकुमारों के लिए थी, इसलिए उन्होंने उसे शिष्य नहीं बनाया। एकलव्य ने उनके चरण छुए और चुपचाप वन लौट गया। पर उसके मन में द्रोण ही गुरु बस चुके थे।
वन में उसने मिट्टी से द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई। हर दिन वह उस मूर्ति को प्रणाम करता और फिर पूरे मन से अभ्यास करता। न कोई सिखाने वाला, न कोई सुधारने वाला — केवल और मेहनत। धीरे-धीरे वह इतना कुशल हो गया कि उसके बाण बिजली की तरह चलते थे।
एक दिन कौरव और पांडव शिकार के लिए उसी वन में आए। उनके साथ एक कुत्ता था, जो एकलव्य को देखकर भौंकने लगा। एकलव्य ने एक साथ सात बाण छोड़े और कुत्ते का मुँह भर दिया, पर कुत्ते को चोट नहीं लगी। कुत्ता चुप होकर लौट आया। राजकुमार हैरान थे — इतना कुशल धनुर्धर कौन है?
उन्होंने एकलव्य को ढूँढ़ा। उसने कहा, 'मैं द्रोणाचार्य का शिष्य हूँ।' अर्जुन उदास हो गए और गुरु से बोले, 'आपने कहा था कि आपका कोई शिष्य मुझसे बढ़कर नहीं होगा।' द्रोण अर्जुन को लेकर एकलव्य के पास गए। एकलव्य ने उन्हें देखते ही दंडवत प्रणाम किया।
द्रोण ने कहा, 'यदि तुम मेरे शिष्य हो, तो गुरुदक्षिणा दो — अपने दाहिने हाथ का अँगूठा।' एकलव्य ने एक पल भी नहीं सोचा। प्रसन्न मुख से उसने अँगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। उसके बाद भी वह बाकी उँगलियों से धनुष चलाता रहा, पर पहले जैसी फुर्ती नहीं रही। आज भी एकलव्य का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
आज के जीवन में सीख
सच्ची लगन हो तो कोई दरवाज़ा बंद नहीं रहता — एकलव्य ने अकेले सीखा। यह कथा यह कठिन प्रश्न भी पूछती है कि गुरु का वचन और न्याय, दोनों को साथ कैसे निभाएँ।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर