मौसल पर्व · अध्याय 50
श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
अब तक की कहानी
प्रभास में यादव आपस में लड़कर नष्ट हो गए। बलराम ने भी योग से देह त्याग दी। श्रीकृष्ण अब अकेले थे।
श्रीकृष्ण समझ गए कि उनके जाने का समय आ गया है और गांधारी के वचन सत्य होने हैं। वे वन में एक पेड़ के नीचे योग में लेट गए, मन को इंद्रियों से समेटकर। उनका एक पैर दूसरे पर टिका था, और तलवा थोड़ा ऊपर दिख रहा था।
उसी समय नाम का एक शिकारी उधर आया। दूर से उसे वह तलवा किसी हिरण का मुख लगा। उसने बाण चलाया, जो श्रीकृष्ण के तलवे में लगा। पास आकर उसने देखा कि वहाँ पीतांबर पहने, चार भुजाओं वाले प्रभु लेटे हैं। वह काँपता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा।
श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी और कोई दोष नहीं दिया। फिर उन्होंने अपने तेज से आकाश और पृथ्वी को प्रकाशित करते हुए देह छोड़ी और अपने लौट गए। देवताओं ने उनकी स्तुति की।
दारुक से समाचार पाकर अर्जुन द्वारका पहुँचे। सूनी नगरी और रोती स्त्रियों को देखकर वे टूट गए। श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव ने भी शोक में प्राण छोड़ दिए। अर्जुन ने सबका अंतिम संस्कार किया और बचे हुए लोगों को लेकर इंद्रप्रस्थ चल पड़े। उनके निकलते ही समुद्र उमड़ा और द्वारका उसमें समा गई।
रास्ते में लुटेरों ने काफ़िले पर हमला किया। अर्जुन ने गांडीव उठाया — पर उसे चढ़ाना कठिन लगा, दिव्य अस्त्रों के मंत्र याद नहीं आए, और अक्षय तरकश भी ख़ाली हो गया। जो अर्जुन कभी पूरी सेनाएँ हरा देते थे, आज बेबस थे। व्यास जी ने उन्हें समझाया, 'अर्जुन, सब कुछ काल के अधीन है। तुम्हारा काम पूरा हुआ। अब तुम्हारे भी जाने का समय है।'
आज के जीवन में सीख
हमारी हर शक्ति, हर सफलता का एक समय होता है। जो यह समझ लेता है, वह जीत में घमंड नहीं करता और हार में टूटता नहीं।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर