सभा पर्व · अध्याय 16
द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
अब तक की कहानी
युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ पूरा हुआ। मय सभा में अपमानित होकर दुर्योधन जलन से भरा हस्तिनापुर लौटा है।
दुर्योधन दिन-रात पांडवों के वैभव के बारे में सोचता रहता। उसके मामा शकुनि ने कहा, 'युद्ध में पांडवों को कोई नहीं हरा सकता, पर युधिष्ठिर को का शौक़ है और वे खेलने का निमंत्रण कभी ठुकराते नहीं। मैं पासे का खिलाड़ी हूँ — पासे मेरी मर्ज़ी से गिरते हैं। खेल में हम उनका सब कुछ जीत लेंगे।'
धृतराष्ट्र पहले हिचकिचाए, पर पुत्र की ज़िद के आगे झुक गए। एक नई सभा बनवाई गई और विदुर को पांडवों को बुलाने भेजा गया। विदुर ने दुखी मन से कहा, 'यह खेल विनाश लाएगा।' युधिष्ठिर ने भी यह समझा, पर बोले, 'बड़ों का बुलावा और खेल की चुनौती — दोनों को ठुकराना मेरे नियम के विरुद्ध है।'
खेल शुरू हुआ। दुर्योधन की ओर से शकुनि पासे फेंक रहा था। हर दाँव पर शकुनि कहता, 'यह देखो, मैं जीता!' युधिष्ठिर पहले रत्न हारे, फिर सोना, रथ, हाथी, सेना, दास-दासियाँ और अंत में पूरा राज्य। हर हार के बाद वे सोचते कि अगले दाँव में सब वापस जीत लेंगे। जुए का यही जाल होता है।
जब धन ख़त्म हो गया, शकुनि ने कहा, 'और क्या है दाँव पर लगाने को?' युधिष्ठिर ने नकुल को दाँव पर लगाया और हार गए। फिर सहदेव, फिर अर्जुन, फिर भीम — एक-एक कर सारे भाई हार गए। फिर उन्होंने स्वयं को दाँव पर लगाया और वह भी हार गए। विदुर बार-बार रोकते रहे, पर किसी ने नहीं सुना। भीष्म और द्रोण सिर झुकाए बैठे रहे।
तब शकुनि ने धीरे से कहा, 'अभी एक दाँव बाक़ी है — तुम्हारी रानी द्रौपदी। उसे लगाओ और सब कुछ वापस जीत लो।' सभा में सन्नाटा छा गया। युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया। पासे गिरे, और शकुनि चिल्लाया, 'जीत लिया!' बड़े-बूढ़ों की आँखें झुक गईं, और दुर्योधन ठहाका मारकर हँस पड़ा।
आज के जीवन में सीख
'बस एक बार और' — यही सोच जुए और हर बुरी लत का सबसे बड़ा जाल है। जहाँ रुकना चाहिए, वहाँ रुक जाना ही असली समझदारी है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर