बालकांड · अध्याय 3

विश्वामित्र और ताड़का वध

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

अयोध्या में राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों भाई गुरु वसिष्ठ से शिक्षा लेकर बड़े हो रहे हैं।

एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए। दशरथ ने उनका बड़ा आदर किया और कहा — ‘मुनिवर, आप जो माँगेंगे, मैं दूँगा।’ विश्वामित्र बोले — ‘मैं यज्ञ कर रहा हूँ, पर मारीच और सुबाहु जैसे राक्षस बार-बार उसे अपवित्र कर देते हैं। अपने बड़े पुत्र राम को कुछ दिनों के लिए मेरे साथ भेज दीजिए।’

यह सुनते ही दशरथ का हृदय काँप गया। राम तब किशोर ही थे। राजा ने कहा कि वे स्वयं सेना लेकर चलेंगे, पर राम को नहीं भेजेंगे। विश्वामित्र क्रोधित हो उठे। तब गुरु वसिष्ठ ने राजा को समझाया कि विश्वामित्र के साथ रहकर राम का कोई अहित नहीं होगा, बल्कि उन्हें दिव्य ज्ञान मिलेगा। दशरथ ने राम को भेज दिया, और लक्ष्मण भी उनके साथ चल पड़े।

रास्ते में सरयू के तट पर विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को नाम की विद्याएँ सिखाईं, जिनसे भूख-प्यास और थकान नहीं सताती। आगे एक घना, डरावना वन आया। विश्वामित्र ने बताया कि यहाँ ताड़का नाम की राक्षसी रहती है, जिसने पूरे प्रदेश को उजाड़ दिया है।

राम पहले स्त्री पर बाण चलाने से हिचके। विश्वामित्र ने समझाया — ‘जो निर्दोषों को सताए, उससे प्रजा की रक्षा करना राजकुमार का धर्म है।’ ताड़का गरजती हुई आई और पत्थर बरसाने लगी। गुरु की आज्ञा मानकर राम ने एक ही बाण से उसका अंत कर दिया। वन फिर से सुरक्षित हो गया। प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने राम को अनेक दिव्य अस्त्र दिए।

फिर सिद्धाश्रम में यज्ञ शुरू हुआ। राम और लक्ष्मण छह दिन-रात बिना सोए पहरा देते रहे। अंतिम दिन मारीच और सुबाहु राक्षसों की सेना लेकर आए। राम ने एक बाण से सुबाहु का वध किया, और से मारीच को सौ योजन दूर समुद्र में फेंक दिया। मारीच बच गया — पर राम का वह बाण वह कभी नहीं भूला। आगे की कथा में वह फिर आएगा।

आज के जीवन में सीख

दशरथ के लिए बेटे को भेजना कठिन था, पर बड़ा बनने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है। अच्छे गुरु के साथ चुनौती का सामना करना ही असली शिक्षा है।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटअहल्या का उद्धार

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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