अरण्यकांड · अध्याय 17
खर-दूषण का वध
अब तक की कहानी
लक्ष्मण ने शूर्पणखा के नाक-कान काट दिए। वह बदला लेने के लिए अपने भाई खर के पास जनस्थान पहुँची।
बहन की हालत देखकर खर आग-बबूला हो गया। पहले उसने चौदह बलवान राक्षस राम को मारने भेजे। राम ने चौदह बाणों से चौदहों को समाप्त कर दिया। शूर्पणखा फिर रोती हुई खर के पास गई। अब खर स्वयं अपने भाई दूषण, सेनापति त्रिशिरा और चौदह हज़ार राक्षसों की विशाल सेना लेकर निकल पड़ा।
दूर से सेना का शोर सुनकर राम ने लक्ष्मण से कहा — ‘तुम सीता को लेकर पर्वत की गुफा में चले जाओ और उनकी रक्षा करो। इन राक्षसों से मैं अकेला निपटूँगा।’ लक्ष्मण ने आज्ञा मानी। राम ने पहना, धनुष पर डोरी चढ़ाई और अकेले सेना के सामने खड़े हो गए।
राक्षसों ने चारों ओर से राम को घेर लिया और अस्त्र-शस्त्रों की बौछार कर दी। पर राम का धनुष बिजली की तरह चल रहा था। उनके बाणों से राक्षस कटते जा रहे थे। देखते-देखते सेना बिखर गई। राम ने पहले दूषण को, फिर तीन सिरों वाले त्रिशिरा को मार गिराया।
अंत में खर बचा। उसने भयंकर युद्ध किया, राम का धनुष तक काट दिया। तब राम ने अगस्त्य मुनि का दिया हुआ धनुष उठाया। अंत में एक तेजस्वी बाण से राम ने खर का भी अंत कर दिया। मानस के अनुसार राम ने ऐसी माया रची कि राक्षस एक-दूसरे में ही राम को देखकर आपस में लड़ मरे।
लगभग एक में पूरा जनस्थान राक्षसों से मुक्त हो गया। ऋषियों और देवताओं ने राम पर फूल बरसाए। लक्ष्मण सीता को लेकर लौटे, और सीता ने प्रसन्न होकर राम को गले लगाया। पर एक राक्षस, अकंपन, बचकर लंका भाग गया — और शूर्पणखा भी। अब यह समाचार रावण तक पहुँचने वाला था।
आज के जीवन में सीख
राम ने ख़तरे के समय पहले सबसे कमज़ोर की सुरक्षा का इंतज़ाम किया, फिर लड़ाई की। अच्छा नेता पहले अपनों की सुरक्षा सोचता है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना