उत्तरकांड · अध्याय 47

वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म

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अब तक की कहानी

अयोध्या में राम राज्य है। प्रजा सुखी है, और श्रीराम प्रजा की हर बात पर ध्यान देते हैं।

यह कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में आती है; तुलसीदास का रामचरितमानस इसे नहीं सुनाता। सीता जी माँ बनने वाली थीं, और उन्होंने इच्छा जताई कि वे गंगा किनारे ऋषियों के आश्रम देखने जाना चाहती हैं। श्रीराम ने प्रसन्न होकर हाँ कह दी।

उसी समय श्रीराम ने अपने एक साथी भद्र से पूछा कि नगर के लोग क्या कहते हैं। भद्र ने संकोच से बताया — लोग आपकी विजय की प्रशंसा करते हैं, पर कुछ लोग सीता जी के लंका में रहने पर बातें बनाते हैं। श्रीराम का हृदय टूट गया। वे जानते थे कि सीता जी पूरी तरह निर्दोष हैं, पर एक राजा के रूप में उन्होंने प्रजा की बात को अपने सुख से ऊपर रखा। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे कठिन दुख बना।

लक्ष्मण भारी मन से सीता जी को रथ में गंगा पार ले गए। वहाँ उन्होंने रोते हुए सच बताया। सीता जी ने धैर्य से सुना। उन्होंने श्रीराम के लिए संदेश दिया — प्रजा का पालन करना आपका धर्म है, उसे निभाइए। मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं। उनकी इस को परंपरा आज भी आदर से याद करती है।

रोती हुई सीता जी को आश्रम के बच्चों ने देखा और महर्षि को ख़बर दी। वाल्मीकि जी ने उन्हें अपनी बेटी की तरह आश्रम में आश्रय दिया। आश्रम की तपस्विनियों ने भी उन्हें प्रेम से अपनाया।

वहीं सीता जी ने दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकि जी ने कुश घास से रक्षा का संस्कार किया, इसलिए बड़े का नाम कुश रखा, और घास के निचले भाग (लव) से छोटे का नाम लव। दोनों बालक ऋषि की छाया में पढ़ते-बढ़ते बड़े होने लगे।

आज के जीवन में सीख

जीवन में कभी-कभी कर्तव्य और प्रेम आमने-सामने आ जाते हैं। सीता जी ने सिखाया कि सबसे कठिन घड़ी में भी गरिमा और धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 5 मिनटलव-कुश ने गाई रामायण

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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