अरण्यकांड · अध्याय 21
शबरी के बेर
अब तक की कहानी
जटायु ने सीता को बचाने में प्राण दे दिए और बताया कि रावण उन्हें दक्षिण की ओर ले गया है। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में दक्षिण की ओर चल पड़े।
सीता को खोजते हुए राम और लक्ष्मण एक घने वन में पहुँचे। वहाँ कबंध नाम के एक विचित्र राक्षस ने अपनी लंबी भुजाओं से दोनों को पकड़ लिया। उसका सिर नहीं था, मुँह पेट में था। दोनों भाइयों ने उसकी भुजाएँ काट दीं। मरते समय कबंध श्राप से मुक्त हुआ और बोला — ‘पंपा सरोवर के पास सुग्रीव से मित्रता कीजिए, वे सीता को खोजने में मदद करेंगे। रास्ते में शबरी से भी मिलिए।’
शबरी एक भीलनी थीं, जो मतंग ऋषि के आश्रम में बरसों तक सेवा करती रहीं। मतंग ऋषि ने स्वर्ग जाते समय उनसे कहा था — ‘एक दिन श्रीराम स्वयं इस आश्रम में आएँगे। तब तक प्रतीक्षा करना।’ उस दिन से शबरी रोज़ रास्ता बुहारतीं, फूल बिछातीं और वन से फल चुनकर लातीं कि शायद आज राम आएँगे। इसी तरह वे बूढ़ी हो गईं।
आख़िर वह दिन आया। राम और लक्ष्मण को देखकर शबरी की आँखों से आँसू बहने लगे। वे प्रभु के चरणों में गिर पड़ीं, उनके पैर धोए और प्रेम से आसन दिया। फिर वे अपने चुने हुए फल लाईं। लोक-परंपरा बड़े प्रेम से कहती है कि शबरी हर बेर चखकर देखती थीं कि वह मीठा है या नहीं, और केवल मीठे बेर ही राम को देती थीं।
राम ने वे बेर बड़े आनंद से खाए और उनकी प्रशंसा की। उन्होंने कहा — ‘मैं केवल प्रेम का नाता मानता हूँ। जाति, कुल, धन या विद्या नहीं, केवल भक्ति देखता हूँ।’ फिर मानस के अनुसार राम ने शबरी को — भक्ति के नौ रूप — समझाए, और कहा कि इनमें से एक भी जिसके पास हो, वह मुझे प्रिय है।
शबरी ने राम को सुग्रीव और ऋष्यमूक पर्वत का रास्ता बताया। फिर प्रभु के दर्शन से तृप्त होकर उन्होंने योग-अग्नि में शरीर त्याग दिया और परम धाम को चली गईं। राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर की ओर बढ़ चले, जहाँ उनकी भेंट हनुमान और सुग्रीव से होनी थी। यहीं अरण्यकांड पूरा होता है।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
पहली भक्ति है संतों की संगति, और दूसरी भक्ति है मेरी कथा-प्रसंगों में प्रेम।
— श्रीरामचरितमानस, अरण्यकांड — शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश
आज के जीवन में सीख
शबरी के पास न धन था, न ऊँचा कुल — बस सच्चा प्रेम और लंबा धैर्य था, और भगवान स्वयं उनके द्वार आए। ईश्वर दिखावा नहीं, दिल देखते हैं।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना