अयोध्याकांड · अध्याय 12
भरत का प्रेम और त्याग
अब तक की कहानी
राम के वियोग में राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए। गुरु वसिष्ठ ने भरत को केकय देश से बुलाने के लिए दूत भेजे।
केकय देश में भरत ने उन्हीं दिनों एक बुरा सपना देखा था, जिससे उनका मन बेचैन था। दूत आए, तो भरत शत्रुघ्न के साथ तुरंत चल पड़े। अयोध्या पहुँचे तो नगर सुनसान था — न उत्सव, न रौनक़। भरत का दिल बैठ गया। वे सीधे माँ कैकेयी के महल गए।
कैकेयी ने ख़ुशी से कहा — ‘बेटा, तुम्हारे पिता स्वर्ग चले गए। पर चिंता मत करो, मैंने तुम्हारे लिए राज्य ले लिया है और राम को चौदह वर्ष के लिए वन भेज दिया है।’ यह सुनकर भरत जैसे पत्थर हो गए। पिता का जाना और भाई का वनवास — दोनों उनकी माँ के कारण!
भरत ने माँ को कठोर शब्दों में धिक्कारा — ‘तुमने कुल का नाश कर दिया। मैं यह राज्य कभी स्वीकार नहीं करूँगा।’ उधर शत्रुघ्न ने मंथरा को पकड़ लिया, पर भरत ने कहा कि स्त्री पर हाथ उठाना ठीक नहीं, और उसे छुड़वा दिया। फिर भरत माता कौसल्या के पास गए और उनके चरणों में गिरकर रोने लगे। कौसल्या ने उन्हें गले से लगा लिया।
भरत ने पिता का किया। फिर गुरु वसिष्ठ और मंत्रियों ने कहा — ‘राजा के बिना राज्य नहीं चल सकता, आप सिंहासन संभालिए।’ भरत ने भरी सभा में उत्तर दिया — ‘यह राज्य राम का है। मैं वन जाकर उन्हें लौटा लाऊँगा। और यदि वे न लौटे, तो मैं भी उनके साथ वन में रहूँगा।’
सारी प्रजा भरत की जय-जयकार कर उठी। तीनों माताएँ, गुरु वसिष्ठ, मंत्री और सेना — सब भरत के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े। गंगा तट पर निषादराज गुह ने इतनी बड़ी सेना देखी तो शक किया कि कहीं भरत राम पर हमला करने तो नहीं जा रहे। पर भरत की आँखों के आँसू देखकर उनका संदेह दूर हो गया, और गुह ने प्रेम से उन्हें गले लगाया।
आज के जीवन में सीख
भरत को बिना माँगे राज्य मिल रहा था, फिर भी उन्होंने उसे ठुकरा दिया क्योंकि वह सही नहीं था। जो चीज़ ग़लत तरीक़े से मिले, उसे छोड़ देना ही असली ईमानदारी है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना