बालकांड · अध्याय 1
रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
अब तक की कहानी
यह कथा का पहला अध्याय है। यहाँ जानिए कि रामायण पहली बार किसने और कैसे लिखी।
तमसा नदी के पास महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। लोक-परंपरा कहती है कि वे पहले रत्नाकर नाम के डाकू थे, जिन्होंने नारद मुनि से मिलकर राम-नाम जपा और इतनी गहरी तपस्या की कि उनके शरीर पर दीमकों की बाँबी बन गई। बाँबी को संस्कृत में ‘वल्मीक’ कहते हैं, इसलिए वे वाल्मीकि कहलाए।
एक दिन देवर्षि नारद उनके आश्रम आए। वाल्मीकि ने पूछा — ‘इस संसार में आज ऐसा कौन है जो गुणवान हो, वीर हो, धर्म को जानता हो, सच बोलता हो और अपने वचन पर अटल रहता हो?’ नारद मुस्कुराए और बोले — ‘ऐसे एक ही हैं, इक्ष्वाकु वंश के श्रीराम।’ फिर उन्होंने संक्षेप में राम की पूरी कथा सुना दी।
नारद के जाने के बाद वाल्मीकि स्नान करने तमसा के तट पर गए। वहाँ एक पेड़ पर पक्षियों का एक जोड़ा प्रेम से बैठा था। तभी एक शिकारी ने तीर चलाया और नर पक्षी तड़पकर गिर पड़ा। मादा पक्षी का करुण रोना सुनकर ऋषि का हृदय दुख से भर गया।
उसी दुख में उनके मुख से अपने-आप एक श्राप निकला — पर वह साधारण वाक्य नहीं था। वह लय और छंद में बँधा एक सुंदर श्लोक था। वाल्मीकि स्वयं चकित रह गए कि शोक से यह कैसे बन गया। परंपरा इसे संसार का पहला काव्य-छंद मानती है, और वाल्मीकि को ‘आदिकवि’ कहती है।
तभी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उन्होंने कहा — ‘यह छंद मेरी ही इच्छा से निकला है। इसी छंद में तुम श्रीराम की पूरी कथा लिखो। जब तक धरती पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक लोग यह कथा सुनते रहेंगे।’ इस तरह वाल्मीकि ने चौबीस हज़ार श्लोकों वाली रामायण की रचना की।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
हे निषाद (शिकारी), तुम्हें कभी स्थायी प्रतिष्ठा न मिले, क्योंकि तुमने प्रेम में डूबे क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मार डाला।
— वाल्मीकि रामायण, बालकांड
आज के जीवन में सीख
वाल्मीकि की कविता दूसरे के दुख को महसूस करने से जन्मी। सच्ची रचनात्मकता अक्सर करुणा से ही शुरू होती है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना