अयोध्याकांड · अध्याय 13

भरत मिलाप और राम की पादुका

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

भरत ने राज्य ठुकरा दिया और राम को वापस लाने के लिए माताओं, गुरु और प्रजा के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े।

चित्रकूट में लक्ष्मण ने दूर से धूल उड़ती देखी और अयोध्या का ध्वज पहचाना। उन्हें लगा कि भरत सेना लेकर लड़ने आ रहे हैं। वे धनुष उठाकर क्रोध में बोले। पर राम ने शांति से कहा — ‘लक्ष्मण, भरत मेरे प्राणों से प्यारे हैं। वे कभी ऐसा नहीं कर सकते।’ लक्ष्मण को अपनी बात पर लज्जा आई।

भरत सेना को पीछे छोड़कर पैदल, नंगे पाँव आश्रम पहुँचे। राम को वल्कल वस्त्रों में देखकर वे ‘भैया!’ कहकर उनके चरणों में गिर पड़े। राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। चारों भाइयों का यह मिलन इतना करुण था कि देखने वाले सब रो पड़े। इसी को कहते हैं। पिता के देहांत का समाचार सुनकर राम ने मंदाकिनी नदी में पिता को जल अर्पित किया।

भरत ने विनती की — ‘भैया, अयोध्या लौट चलिए। राज्य आपका है।’ माताओं और गुरुओं ने भी समझाया। मानस के अनुसार राजा जनक भी वहाँ पहुँचे। पर राम ने कहा — ‘पिताजी ने जो वचन दिया, उसे झूठा करना हम दोनों के लिए पाप होगा। तुम्हारा धर्म राज्य संभालना है, मेरा धर्म वन में रहना।’

जब भरत ने देखा कि राम नहीं मानेंगे, तो उन्होंने राम की (खड़ाऊँ) माँगी। राम ने अपनी पादुकाएँ दे दीं। भरत ने उन्हें सिर पर रखा और प्रण किया — ‘चौदह वर्ष ये पादुकाएँ ही राज करेंगी। मैं इनका सेवक बनकर राज्य चलाऊँगा। और यदि चौदह वर्ष पूरे होने पर आप न लौटे, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर लूँगा।’

अयोध्या लौटकर भरत ने पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान किया। वे स्वयं नगर से बाहर नंदीग्राम में रहने लगे — राम की तरह ही जटा रखकर, वल्कल पहनकर, ज़मीन पर सोकर और कंद-मूल खाकर। चौदह वर्ष तक उन्होंने राज्य चलाया, पर हर निर्णय पादुकाओं के सामने निवेदन करके लिया।

आज के जीवन में सीख

भरत के पास सत्ता थी, पर उन्होंने ख़ुद को सिर्फ़ सेवक माना। पद मिलने पर घमंड नहीं, ज़िम्मेदारी बढ़नी चाहिए।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटअत्रि और अनसूया का आशीर्वाद

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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