किष्किंधाकांड · अध्याय 22
श्रीराम और हनुमान का मिलन
अब तक की कहानी
रावण ने पंचवटी से माता सीता का हरण कर लिया है। जटायु और शबरी के बताए रास्ते पर चलते हुए श्रीराम और लक्ष्मण पंपा सरोवर के पास पहुँचे हैं।
पंपा सरोवर के पास पर्वत था। वहाँ वानर सुग्रीव अपने कुछ साथियों के साथ छिपकर रहता था, क्योंकि उसका बड़ा भाई बाली उसकी जान का दुश्मन बन गया था। जब सुग्रीव ने धनुष-बाण लिए दो तेजस्वी युवकों को आते देखा, तो वह डर गया। कहीं बाली ने तो इन्हें नहीं भेजा?
सुग्रीव ने अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री हनुमान को भेजा। हनुमान जी एक ब्राह्मण का रूप लेकर दोनों भाइयों के पास पहुँचे और बड़ी विनम्रता से पूछा — आप कौन हैं? आपके हाथ धनुष के योग्य हैं, पर वेश तपस्वियों का है। इस घने वन में आप क्यों घूम रहे हैं?
श्रीराम हनुमान जी की बातों से बहुत प्रभावित हुए। वाल्मीकि रामायण में वे लक्ष्मण से कहते हैं — इसकी वाणी में एक भी अशुद्धि नहीं है। जिसने वेदों को ठीक से पढ़ा हो, वही ऐसे बोल सकता है। फिर श्रीराम ने अपना परिचय दिया और बताया कि वे सीता की खोज में भटक रहे हैं।
'राम' नाम सुनते ही हनुमान जी अपने प्रभु को पहचान गए। वे तुरंत अपने असली रूप में आए और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। आँखों से आँसू बह रहे थे। यह वह क्षण था जिसकी प्रतीक्षा उनका मन न जाने कब से कर रहा था।
हनुमान जी ने दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बिठाया और पर्वत पर सुग्रीव के पास ले चले। रास्ते में उन्होंने सुग्रीव का दुख भी सुनाया। उसी दिन से हनुमान जी श्रीराम के सबसे प्रिय बन गए — एक ऐसा रिश्ता जिसे भक्त आज भी हर दिन याद करते हैं।
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना॥
प्रभु को पहचानकर हनुमान जी उनके चरण पकड़कर गिर पड़े। शिव जी कहते हैं — हे उमा, उस सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता।
— श्रीरामचरितमानस, किष्किंधाकांड
आज के जीवन में सीख
पहली मुलाक़ात में आपकी विनम्रता और बोलने का ढंग ही आपका परिचय होता है। अच्छे शब्द दरवाज़े खोलते हैं।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना