अयोध्याकांड · अध्याय 8
कैकेयी के दो वरदान
अब तक की कहानी
दशरथ ने राम को युवराज बनाने का निश्चय किया। पर दासी मंथरा ने कैकेयी के मन में ईर्ष्या भर दी।
कैकेयी ने अपने सारे गहने उतार फेंके, मैले कपड़े पहने और में ज़मीन पर जा लेटीं। रात को जब दशरथ उन्हें यह शुभ समाचार देने आए, तो उन्हें इस हाल में देखकर घबरा गए। उन्होंने पूछा — ‘प्रिये, तुम्हें किसने दुख दिया? जो चाहो माँगो।’ दशरथ ने राम की सौगंध खाकर वचन दे दिया।
तब कैकेयी ने पुरानी बात याद दिलाई। बहुत पहले देवताओं और असुरों के युद्ध में दशरथ घायल हो गए थे। तब कैकेयी ने ही रथ हाँककर उन्हें सुरक्षित निकाला था। प्रसन्न होकर दशरथ ने दो वर दिए थे, जिन्हें कैकेयी ने ‘बाद में माँग लूँगी’ कहकर रख लिया था।
कैकेयी बोलीं — ‘पहला वर: राम की जगह मेरे भरत का राज्याभिषेक हो। दूसरा वर: राम चौदह वर्षों के लिए तपस्वी के वेश में वन जाएँ।’ यह सुनते ही दशरथ जैसे वज्र से मारे गए। वे गिर पड़े, रोए, गिड़गिड़ाए, कैकेयी के पैर तक पकड़े — पर कैकेयी नहीं पिघलीं। पूरी रात राजा तड़पते रहे।
सुबह मंत्री सुमंत्र राम को बुलाकर लाए। पिता की दशा देखकर राम चिंतित हुए। दशरथ कुछ बोल न सके, तो कैकेयी ने ही सब बता दिया। राम का चेहरा ज़रा भी नहीं बदला। उन्होंने शांति से कहा — ‘माँ, पिताजी के वचन के लिए मैं आग में भी कूद सकता हूँ। भरत राजा बनें, इससे बढ़कर सुख क्या? मैं आज ही वन जाऊँगा।’
रघुकुल की यही रीति थी — प्राण चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन न टूटे। जिस राम को कुछ घंटों में राजा बनना था, वे मुस्कुराते हुए वनवास स्वीकार कर रहे थे। उनके लिए राज्य से बड़ा था पिता का सम्मान और । इसीलिए श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है।
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
रघुकुल की यह रीति सदा से चली आई है कि प्राण भले ही चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन नहीं जाना चाहिए।
— श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकांड
आज के जीवन में सीख
राम ने बड़ी हानि को भी बिना कड़वाहट के स्वीकार किया। जब हालात हमारे बस में न हों, तब भी हमारा व्यवहार हमारे बस में होता है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना