लंकाकांड · अध्याय 37
अंगद बने शांति-दूत
अब तक की कहानी
राम सेतु बनकर तैयार है। श्रीराम की सेना समुद्र पार करके लंका के पास सुवेल पर्वत पर डेरा डाल चुकी है।
युद्ध से पहले श्रीराम ने एक आख़िरी बार शांति का रास्ता खोला। उन्होंने बाली के पुत्र अंगद को दूत बनाकर भेजा। संदेश सीधा था — सीता जी को लौटा दो, तो युद्ध नहीं होगा।
अंगद रावण की सभा में पहुँचे। रावण ने उनका मज़ाक उड़ाया — तू तो बाली का बेटा है, जिसे राम ने मारा। फिर भी उन्हीं का दूत बना है? अंगद ने शांत रहकर कहा — मैं धर्म के साथ हूँ। तुम भी अपना भला चाहते हो तो श्रीराम की शरण में चलो।
रामचरितमानस का सबसे प्रसिद्ध दृश्य यहीं आता है। अंगद ने सभा के बीच अपना पैर ज़मीन पर जमा दिया और कहा — अगर तुम्हारा कोई भी वीर मेरा पैर हिला दे, तो श्रीराम लौट जाएँगे और मैं सीता जी को हार जाऊँगा। एक-एक करके बड़े-बड़े योद्धा आए, पूरा ज़ोर लगाया, पर पैर न हुआ।
आख़िर रावण स्वयं उठा। जैसे ही वह अंगद का पैर पकड़ने झुका, अंगद ने पैर हटा लिया और बोले — मेरे पैर पकड़ने से तुम्हारा भला नहीं होगा। पकड़ने ही हैं तो श्रीराम के चरण पकड़ो। रावण शर्मिंदा होकर अपने सिंहासन पर लौट गया।
वाल्मीकि रामायण में अंगद संदेश देकर महल की छत पर छलाँग लगाते हैं, उसका ऊपरी हिस्सा तोड़ देते हैं, और लौट आते हैं। दोनों कथाओं में बात एक ही है — रावण ने शांति का आख़िरी मौका भी ठुकरा दिया। अब युद्ध था।
आज के जीवन में सीख
लड़ाई से पहले हमेशा बातचीत का रास्ता आज़माइए। और जब आप सच के साथ खड़े हों, तो आपके पैर कोई नहीं हिला सकता।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना