नवम स्कंध · अध्याय 10
राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
अब तक की कहानी
मत्स्य अवतार की कथा के बाद शुकदेव जी सूर्यवंश के राजाओं का वर्णन करते हैं। उनमें एक महान भक्त थे — राजा अंबरीष।
राजा अंबरीष सातों द्वीपों के स्वामी थे, फिर भी उनका मन भगवान में लगा रहता। उनकी आँखें मंदिर के दर्शन में, कान कथा में और हाथ सेवा में लगे रहते। एक बार उन्होंने पूरे साल का व्रत किया। अंत में कार्तिक की द्वादशी को व्रत खोलने (पारण) की तैयारी थी।
तभी महान ऋषि दुर्वासा आ पहुँचे। राजा ने उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। ऋषि बोले — पहले मैं यमुना में स्नान करके आता हूँ। पर उन्हें बहुत देर हो गई और द्वादशी का समय निकलने वाला था। राजा दुविधा में पड़ गए — अतिथि से पहले खाएँ तो अनादर, और समय पर पारण न करें तो व्रत अधूरा।
ब्राह्मणों की सलाह पर राजा ने केवल थोड़ा-सा जल पीकर व्रत खोला, जो खाने जैसा भी है और नहीं भी। दुर्वासा लौटे और समझ गए। वे क्रोध से भर गए और अपनी जटा से एक भयंकर राक्षसी कृत्या पैदा कर दी। राजा शांत खड़े रहे। तभी भगवान का सुदर्शन चक्र आया, कृत्या को नष्ट किया और दुर्वासा के पीछे लग गया।
दुर्वासा जान बचाकर ब्रह्मा जी के पास भागे, फिर शिव जी के पास — पर कोई चक्र को रोक न सका। अंत में वे वैकुंठ में भगवान विष्णु के चरणों में गिरे। भगवान ने कहा — मैं तो अपने भक्तों के अधीन हूँ, मानो मैं स्वतंत्र ही नहीं। जिनका आपने अपराध किया है, उन्हीं से क्षमा माँगिए।
दुर्वासा लौटकर अंबरीष के चरणों में गिर पड़े। राजा को बड़ा संकोच हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर सुदर्शन चक्र की स्तुति की और चक्र शांत हो गया। इस पूरे समय — कहते हैं लगभग एक वर्ष — राजा ने भोजन नहीं किया था, ऋषि की प्रतीक्षा में। उन्होंने पहले दुर्वासा को आदर से भोजन कराया, फिर स्वयं प्रसाद लिया।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
हे ब्राह्मण, मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ, मानो स्वतंत्र नहीं। साधु भक्तों ने मेरे हृदय को जीत लिया है; भक्त मुझे बहुत प्यारे हैं।
— श्रीमद्भागवत 9.4.63
आज के जीवन में सीख
जिसका मन शांत और विनम्र है, उसकी रक्षा अपने-आप होती है। सच्चा बड़प्पन उसे भी आदर देता है जिसने हमें कष्ट दिया।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति