दशम स्कंध · अध्याय 19

उद्धव जी और गोपियों का प्रेम

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

कृष्ण ने कंस का अंत किया और मथुरा में रहने लगे। पर वृंदावन की याद उन्हें हमेशा आती रही।

उद्धव जी कृष्ण के मित्र और मंत्री थे — बहुत बड़े ज्ञानी। एक दिन कृष्ण ने उनका हाथ पकड़कर कहा — उद्धव, व्रज जाओ। मेरे माता-पिता को सुख दो और गोपियों को मेरा संदेश दो। वे मेरे बिना बहुत दुखी हैं। उद्धव कृष्ण का पीतांबर पहनकर रथ से वृंदावन पहुँचे।

शाम को गायें लौट रही थीं। नंद बाबा और यशोदा ने उद्धव को गले लगाया और कृष्ण के बारे में पूछते-पूछते रो पड़े। उद्धव ने उन्हें समझाया कि कृष्ण साधारण पुत्र नहीं, स्वयं भगवान हैं और सबके हृदय में हैं। पर माँ-बाप का मन तो बस अपने लाला को याद करता रहा।

सुबह गोपियों ने कृष्ण के रथ को पहचाना और उद्धव को घेर लिया। उसी समय एक भौंरा वहाँ आया। एक गोपी उसी भौंरे को कृष्ण का दूत मानकर बोलने लगी — तू भी अपने स्वामी जैसा है, फूलों का रस लेकर उड़ जाता है! इसे कहते हैं — शिकायत में भी प्रेम भरा हुआ।

उद्धव ने कृष्ण का संदेश सुनाया — मैं तुमसे कभी दूर नहीं; जैसे आकाश, जल, वायु सबमें हैं, वैसे ही मैं तुम सबमें हूँ। ध्यान से मुझे पाओ। गोपियाँ बोलीं — उद्धव, ध्यान तो वह करे जिसका मन उसके पास हो। हमारा मन तो कृष्ण ले गए, अब ध्यान किस मन से करें?

उद्धव कई महीने व्रज में रहे। गोपियों का प्रेम देखकर उनका ज्ञान का घमंड पिघल गया। उन्होंने कहा — इनके प्रेम के आगे मेरा सारा ज्ञान छोटा है। मेरी तो इच्छा है कि मैं वृंदावन की कोई लता या झाड़ी बनूँ, ताकि इन गोपियों के चरणों की धूल मुझ पर पड़े। फिर वे लौटकर कृष्ण को व्रज का हाल सुनाने गए।

आज के जीवन में सीख

ज्ञान रास्ता दिखाता है, पर प्रेम मंज़िल तक पहुँचाता है। सच्चा ज्ञानी वही है जो दूसरों से सीखने को तैयार रहे।

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सभी अध्याय

  1. 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
  2. 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
  3. 3बालक ध्रुव की तपस्या
  4. 4भक्त प्रह्लाद
  5. 5नरसिंह अवतार
  6. 6गजेंद्र मोक्ष
  7. 7समुद्र मंथन और मोहिनी
  8. 8वामन अवतार और राजा बलि
  9. 9मत्स्य अवतार
  10. 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
  11. 11श्रीकृष्ण का जन्म
  12. 12पूतना का उद्धार
  13. 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
  14. 14कालिय नाग का दमन
  15. 15गोवर्धन पर्वत उठाना
  16. 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
  17. 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
  18. 18मथुरा में कंस का अंत
  19. 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
  20. 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
  21. 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
  22. 22स्यमंतक मणि की कथा
  23. 23जरासंध का अंत
  24. 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
  25. 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
  26. 26राजा परीक्षित की मुक्ति

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