अष्टम स्कंध · अध्याय 7

समुद्र मंथन और मोहिनी

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अब तक की कहानी

गजेंद्र की कथा के बाद शुकदेव जी बताते हैं कि जब देवता दैत्यों से हारकर कमज़ोर हो गए, तब भगवान ने क्या उपाय बताया।

दैत्यों से युद्ध में देवता हार गए थे और उनकी शक्ति घट गई थी। वे ब्रह्मा जी के साथ भगवान विष्णु की शरण में गए। भगवान ने कहा — अभी दैत्यों से मित्रता करो और मिलकर क्षीरसागर को मथो। उसमें से निकलेगा, जिसे पीकर तुम फिर बलवान हो जाओगे।

मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकि नाग को रस्सी। मंथन शुरू हुआ तो भारी पर्वत समुद्र में डूबने लगा। तब भगवान ने विशाल कछुए — कूर्म — का रूप लिया और पर्वत को अपनी पीठ पर उठा लिया। मंथन फिर चल पड़ा।

सबसे पहले हलाहल नाम का भयानक विष निकला, जिससे सारा संसार जलने लगा। सब भगवान शिव के पास गए। करुणा से भरे शिव जी ने माता पार्वती की सहमति से वह विष पी लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया। उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।

फिर कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष और अप्सराएँ निकलीं। फिर लक्ष्मी जी प्रकट हुईं और उन्होंने भगवान विष्णु को वरमाला पहनाई। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर निकले। दैत्यों ने झपटकर कलश छीन लिया।

तब भगवान ने अत्यंत सुंदर स्त्री मोहिनी का रूप लिया। दैत्य उनकी सुंदरता पर मोहित होकर बोले — आप ही अमृत बाँट दीजिए। मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाया। राहु नाम का दैत्य वेश बदलकर देवताओं में बैठ गया, पर सूर्य-चंद्र ने उसे पहचान लिया और भगवान ने चक्र से उसका सिर काट दिया। इस तरह मेहनत सबकी थी, पर अमृत धर्म के पक्ष को मिला।

आज के जीवन में सीख

जीवन के मंथन में पहले कठिनाइयाँ निकलती हैं, फिर अच्छी चीज़ें। शिव जी सिखाते हैं कि सबकी भलाई के लिए कड़वा घूँट पीना भी बड़प्पन है।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 5 मिनटवामन अवतार और राजा बलि

सभी अध्याय

  1. 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
  2. 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
  3. 3बालक ध्रुव की तपस्या
  4. 4भक्त प्रह्लाद
  5. 5नरसिंह अवतार
  6. 6गजेंद्र मोक्ष
  7. 7समुद्र मंथन और मोहिनी
  8. 8वामन अवतार और राजा बलि
  9. 9मत्स्य अवतार
  10. 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
  11. 11श्रीकृष्ण का जन्म
  12. 12पूतना का उद्धार
  13. 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
  14. 14कालिय नाग का दमन
  15. 15गोवर्धन पर्वत उठाना
  16. 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
  17. 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
  18. 18मथुरा में कंस का अंत
  19. 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
  20. 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
  21. 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
  22. 22स्यमंतक मणि की कथा
  23. 23जरासंध का अंत
  24. 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
  25. 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
  26. 26राजा परीक्षित की मुक्ति

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