प्रथम स्कंध · अध्याय 2
राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
अब तक की कहानी
व्यास जी ने भागवत की रचना कर अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाई। अब पांडवों के बाद अर्जुन के पोते परीक्षित हस्तिनापुर के राजा हैं।
परीक्षित अर्जुन के पोते और अभिमन्यु के पुत्र थे। जब वे माँ उत्तरा के गर्भ में थे, तब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा की थी। बड़े होकर वे धर्मात्मा राजा बने। एक बार दिग्विजय के समय उन्होंने देखा कि एक बैल और एक गाय को पीट रहा है। बैल धर्म था और गाय पृथ्वी।
राजा ने कलि को मारने के लिए तलवार उठाई, तो वह उनके चरणों में गिर पड़ा। शरण में आए को परीक्षित ने नहीं मारा, पर उसे रहने के लिए कुछ ही स्थान दिए — जुआ, नशा, अनैतिक संबंध, हिंसा और सोना। कहते हैं, कलि राजा के सोने के मुकुट में भी जा बैठा।
एक दिन शिकार खेलते हुए राजा बहुत प्यासे होकर शमीक ऋषि के आश्रम पहुँचे। ऋषि गहरे ध्यान में थे और उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। राजा को अपमान लगा और उन्होंने पास पड़ा एक मरा हुआ साँप ऋषि के गले में डाल दिया। ऋषि के छोटे पुत्र शृंगी ने यह सुना तो क्रोध में श्राप दे दिया — आज से सातवें दिन तक्षक नाग इस राजा को डसेगा।
महल लौटकर परीक्षित को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। श्राप की बात सुनकर वे डरे नहीं, बल्कि इसे भगवान की कृपा माना। उन्होंने राज्य पुत्र जनमेजय को सौंपा और गंगा के किनारे अन्न-जल त्यागकर बैठ गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनि इकट्ठा हो गए।
राजा ने सबसे पूछा — जिसकी मृत्यु निकट हो, उसे क्या करना चाहिए? तभी सोलह वर्ष के दिखने वाले, तेजस्वी शुकदेव जी वहाँ पहुँचे। सब ऋषि उनके सम्मान में खड़े हो गए। शुकदेव जी ने कहा — भगवान की कथा सुनना और उनका नाम लेना ही सबसे बड़ा उपाय है। और फिर सात दिनों तक उन्होंने परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुनाई।
निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्। पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥
भागवत वेदरूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है, जो शुकदेव जी के मुख से अमृत जैसा मीठा होकर आया है। हे रसिक भक्तों, इस रस को बार-बार पियो।
— श्रीमद्भागवत 1.1.3
आज के जीवन में सीख
गलती सबसे होती है; बड़ा वही है जो उसे मानकर सुधार की राह चुन ले। समय कम हो तो उसे सबसे ज़रूरी चीज़ में लगाना चाहिए।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति