अष्टम स्कंध · अध्याय 8
वामन अवतार और राजा बलि
अब तक की कहानी
समुद्र मंथन के बाद देवता फिर शक्तिशाली हुए। पर समय बदला, और प्रह्लाद के पोते बलि ने स्वर्ग जीत लिया।
दैत्यराज बलि प्रह्लाद के पोते थे — वीर, दानी और गुरु शुक्राचार्य के आज्ञाकारी। गुरु की कृपा से उन्होंने स्वर्ग जीत लिया और देवता बेघर हो गए। देवताओं की माँ अदिति बहुत दुखी हुईं। उन्होंने पति कश्यप ऋषि के कहने पर भगवान का पयोव्रत किया। भगवान ने प्रसन्न होकर कहा — मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में आऊँगा।
भगवान अदिति के गर्भ से एक छोटे, तेजस्वी ब्राह्मण बालक वामन के रूप में जन्मे। उस समय बलि नर्मदा के किनारे एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे। छाता और कमंडल लिए वामन वहाँ पहुँचे। उनका तेज देखकर सब ऋषि खड़े हो गए और बलि ने आदर से उनके चरण धोए।
बलि ने कहा — माँगिए, जो चाहिए। वामन ने कहा — मुझे बस अपने पैरों से तीन पग धरती चाहिए। बलि हँसे — इतना छोटा दान? पर वामन ने कहा कि संतोष ही ब्राह्मण का धन है। तभी शुक्राचार्य ने बलि को चेताया — यह स्वयं विष्णु हैं, ये तुम्हारा सब कुछ ले लेंगे। बलि ने कहा — मैंने वचन दिया है, अब पीछे नहीं हटूँगा।
जैसे ही बलि ने का जल छोड़ा, वामन का शरीर बढ़ने लगा और वे विराट बन गए। एक पग में उन्होंने पूरी धरती नाप ली, दूसरे में सारा आकाश और स्वर्ग। फिर पूछा — तीसरा पग कहाँ रखूँ? बलि ने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया — प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।
भगवान बलि की सच्चाई और समर्पण से बहुत प्रसन्न हुए। तभी प्रह्लाद भी वहाँ आ गए। भगवान ने बलि को सुतल लोक का राज्य दिया, जो स्वर्ग से भी सुंदर था, और वचन दिया कि वे स्वयं उसके द्वार की रक्षा करेंगे। देवताओं को स्वर्ग वापस मिला और बलि को भगवान का साथ।
आज के जीवन में सीख
अपनी बात पर टिके रहना सबसे बड़ा धन है। बलि ने सब कुछ देकर भी सबसे बड़ी चीज़ पा ली।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति