सप्तम स्कंध · अध्याय 4
भक्त प्रह्लाद
अब तक की कहानी
ध्रुव ने बचपन में भगवान को पाया। अब कथा एक और बाल-भक्त की है, जिसका पिता ही भगवान का सबसे बड़ा शत्रु था।
दैत्यराज हिरण्यकशिपु के भाई हिरण्याक्ष को भगवान विष्णु ने वराह अवतार में मारा था। बदला लेने के लिए हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से वरदान माँगा — मैं न किसी मनुष्य से मरूँ, न पशु से; न दिन में, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र-शस्त्र से। वरदान पाकर वह ख़ुद को अमर समझने लगा।
उसका बेटा प्रह्लाद बचपन से ही हरि का भक्त था। जब वह माँ कयाधु के गर्भ में था, तब माँ नारद जी के आश्रम में रही थीं और प्रह्लाद ने वहीं भक्ति की बातें सुन ली थीं। गुरुकुल में शिक्षक उसे राजनीति पढ़ाते, पर वह साथी बालकों को भगवान की भक्ति सिखाने लगता।
एक दिन पिता ने बड़े प्यार से पूछा — बेटा, तुमने अब तक क्या सबसे अच्छा सीखा? प्रह्लाद ने कहा — भगवान की : उनकी कथा सुनना, कीर्तन करना, स्मरण करना, चरणों की सेवा, पूजा, वंदना, दास-भाव, मित्र-भाव और ख़ुद को उन्हें सौंप देना। यह सुनते ही हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया।
उसने अपने ही बेटे को मारने के कई उपाय किए। सैनिकों ने हथियारों से वार किया, पागल हाथियों के आगे डाला, ज़हरीले साँपों से डसवाया, विष दिया, ऊँचे पहाड़ से गिराया, आग में डाला। पर हर बार प्रह्लाद हरि का नाम लेता रहा और उसे कुछ नहीं हुआ। लोक-परंपरा में होलिका की कथा भी इसी से जुड़ी है।
प्रह्लाद ने कभी पिता से नफ़रत नहीं की। वह शांत रहकर बस यही कहता कि भगवान हर जगह हैं — मुझमें, आपमें, हर जीव में। उसकी यह निडर भक्ति ही आगे भगवान के एक अद्भुत अवतार का कारण बनी।
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
भगवान विष्णु की कथा सुनना, कीर्तन, स्मरण, चरण-सेवा, पूजा, वंदना, दास-भाव, सखा-भाव और आत्म-समर्पण — ये भक्ति के नौ रूप हैं।
— श्रीमद्भागवत 7.5.23
आज के जीवन में सीख
सच्चाई पर टिके रहने के लिए नफ़रत ज़रूरी नहीं। प्रह्लाद अडिग भी था और विनम्र भी।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति