दशम स्कंध · अध्याय 23
जरासंध का अंत
अब तक की कहानी
कृष्ण द्वारका में राज-काज देखते हैं। जरासंध अब भी शक्तिशाली है और उसने बहुत से राजाओं को बंदी बना रखा है।
एक दिन द्वारका की सभा में एक दूत आया। वह उन हज़ारों राजाओं का संदेश लाया था जिन्हें जरासंध ने बंदी बना रखा था — हे कृष्ण, हम आपकी शरण में हैं, हमें इस कैद से छुड़ाइए। उसी समय नारद जी आए और बताया कि युधिष्ठिर करना चाहते हैं और कृष्ण को बुला रहे हैं।
उद्धव जी ने सलाह दी कि दोनों काम एक साथ हो सकते हैं। राजसूय के लिए जरासंध को जीतना ज़रूरी था, और उसे हराने से बंदी राजा भी छूट जाते। जरासंध से सेना लेकर लड़ना कठिन था, इसलिए उसे अकेले कुश्ती में हराना ही उपाय था।
कृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मणों का वेश बनाकर मगध पहुँचे। जरासंध ब्राह्मणों का आदर करता था। उन्होंने उससे भिक्षा में युद्ध माँगा। जरासंध समझ गया कि ये कौन हैं, पर उसने वचन निभाया और भीम से गदा-युद्ध स्वीकार किया।
भीम और जरासंध कई दिनों तक लड़ते रहे — दिन में युद्ध, रात में मित्र की तरह आराम। दोनों बराबर थे। कृष्ण जानते थे कि जरासंध का शरीर जन्म के समय दो टुकड़ों में था, जिसे जरा नाम की राक्षसी ने जोड़ा था। उन्होंने एक तिनका बीच से चीरकर भीम को इशारा किया। भीम ने जरासंध को उसी तरह दो भागों में चीर दिया।
कृष्ण ने कारागार के सब राजाओं को मुक्त किया। वे दुबले और दुखी थे, पर कृष्ण को देखते ही हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। कृष्ण ने उन्हें सम्मान से उनके राज्य लौटाए। जरासंध के बेटे सहदेव को मगध का राजा बनाया गया। फिर युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ पूरा हुआ।
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा को — जो शरण में आए लोगों के दुख मिटाते हैं — उन गोविंद को बार-बार नमस्कार।
— मुक्त राजाओं की स्तुति, श्रीमद्भागवत दशम स्कंध
आज के जीवन में सीख
ताक़त से नहीं, समझ से बड़ी समस्या सुलझती है। और सच्चा नेता जीत का इस्तेमाल दूसरों को आज़ाद करने में करता है।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति