दशम स्कंध · अध्याय 17
अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
अब तक की कहानी
रास लीला के बाद कृष्ण ने वृंदावन में अरिष्टासुर और केशी जैसे असुरों का भी अंत किया। अब कंस को पक्का पता चल गया है कि कृष्ण कौन हैं।
नारद जी ने कंस को बता दिया था कि कृष्ण और बलराम वास्तव में वसुदेव के पुत्र हैं। कंस ने एक चाल चली। उसने मथुरा में धनुष-यज्ञ और कुश्ती का उत्सव रखा और यदुवंशी अक्रूर को भेजा कि दोनों भाइयों को निमंत्रण देकर ले आओ। वह उन्हें वहीं मरवाना चाहता था।
अक्रूर जी कृष्ण के बड़े भक्त थे। रथ पर वृंदावन जाते हुए वे रास्ते भर यही सोचते रहे — आज मैं उन चरणों के दर्शन करूँगा जिनकी पूजा ब्रह्मा और शिव करते हैं! वृंदावन की धूल में कृष्ण के पैरों के निशान देखते ही वे रथ से उतरकर उस धूल में लोटने लगे।
कृष्ण और बलराम ने उन्हें गले लगाया, आदर से भोजन कराया और सारी बात सुनी। कृष्ण ने मथुरा चलना स्वीकार किया। यह ख़बर सुनते ही व्रज में जैसे दुख की आँधी आ गई। गोपियाँ रोने लगीं — यह अक्रूर नहीं, क्रूर है, जो हमारे प्राण ले जा रहा है!
अगली सुबह गोपियाँ रथ के आगे खड़ी हो गईं। यशोदा का दुख तो कहा नहीं जा सकता। कृष्ण ने उन्हें प्यार भरा संदेश भेजा — मैं लौटकर आऊँगा। रथ चल पड़ा, और गोपियाँ तब तक खड़ी रहीं जब तक रथ की उड़ती धूल भी दिखती रही।
रास्ते में यमुना किनारे अक्रूर जी स्नान करने उतरे। पानी में डुबकी लगाई तो देखा — वहाँ कृष्ण और बलराम हैं! ऊपर देखा तो वे रथ में भी बैठे थे। फिर डुबकी लगाई तो जल में शेषनाग पर विराजमान चतुर्भुज भगवान के हुए। अक्रूर जी ने वहीं भाव-विभोर होकर स्तुति की।
आज के जीवन में सीख
जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनसे बिछड़ना कठिन है, पर सच्चा प्रेम दूरी से कम नहीं होता।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति