सप्तम स्कंध · अध्याय 5
नरसिंह अवतार
अब तक की कहानी
हिरण्यकशिपु ने अपने भक्त पुत्र प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए, पर हर बार भगवान ने उसकी रक्षा की।
आख़िर में हिरण्यकशिपु ने ख़ुद तलवार उठाई और गरजकर पूछा — तू किसके बल पर इतना निडर है? कहाँ है तेरा भगवान? प्रह्लाद ने शांति से कहा — वे हर जगह हैं। हिरण्यकशिपु ने महल के एक खंभे की ओर इशारा किया — क्या इस खंभे में भी हैं? प्रह्लाद ने कहा — हाँ, इसमें भी।
हिरण्यकशिपु ने ज़ोर से खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण एक भयानक गर्जना हुई और खंभा फटकर भगवान प्रकट हुए — आधा शरीर मनुष्य का, आधा सिंह का। आँखें आग जैसी, गर्दन पर घने बाल, और तेज़ नाखून।
भगवान ने ब्रह्मा जी के वरदान की हर शर्त का मान रखा। समय संध्या का था — न दिन, न रात। उन्होंने हिरण्यकशिपु को महल की देहरी पर पकड़ा — न अंदर, न बाहर। अपनी जंघा पर रखा — न धरती, न आकाश। और नाखूनों से उसका अंत किया — न अस्त्र, न शस्त्र। वे न पूरे मनुष्य थे, न पूरे पशु।
भगवान का क्रोध इतना प्रचंड था कि देवता, ब्रह्मा जी और यहाँ तक कि लक्ष्मी जी भी पास जाने से डर रहे थे। तब ब्रह्मा जी ने छोटे प्रह्लाद को भेजा। प्रह्लाद ने निडर होकर भगवान को प्रणाम किया और स्तुति की। भगवान ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा और उनका क्रोध शांत हो गया।
भगवान ने वर माँगने को कहा। प्रह्लाद बोला — मेरे मन में कभी कोई कामना ही न उठे, यही वर दीजिए। फिर उसने अपने पिता के उद्धार की प्रार्थना की। भगवान ने कहा कि ऐसे भक्त के कारण उसकी कई पीढ़ियाँ तर गईं। प्रह्लाद राजा बना और धर्म से राज किया।
आज के जीवन में सीख
भगवान अपने भक्त का वचन सच करने के लिए खंभे से भी प्रकट हो सकते हैं। और सच्चा भक्त वरदान में भी अपने लिए कुछ नहीं माँगता।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति