साप्ताहिक व्रत · अध्याय 7

शनिवार (शनि देव) व्रत कथा

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अब तक की कहानी

शनिवार शनि देव का दिन माना जाता है। यह कथा राजा विक्रमादित्य और शनि देव की है।

परंपरा से शनिवार का व्रत शुक्ल पक्ष के शनिवार से शुरू किया जाता है। भक्त काले या नीले वस्त्र पहनते हैं, शनि देव को सरसों या तिल का तेल, काले तिल और उड़द चढ़ाते हैं, पीपल के नीचे दीपक जलाते हैं, कथा सुनते हैं और ज़रूरतमंदों को दान करते हैं।

एक बार नौ ग्रहों में विवाद हुआ कि सबसे बड़ा कौन है। वे न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के पास गए। राजा ने सोने, चाँदी, काँसे, लोहे आदि नौ धातुओं के सिंहासन क्रम से रखवाए और कहा, अपने-अपने आसन पर बैठिए — जो पहले आसन पर बैठेगा वह बड़ा। शनि देव का आसन लोहे का था और सबसे अंत में। वे क्रोधित हो गए और बोले — राजा, तुमने मेरा अपमान किया है। अब मेरी दृष्टि का प्रभाव देखना।

कुछ समय बाद शनि देव घोड़ों के व्यापारी बनकर आए। राजा एक घोड़े पर बैठा तो घोड़ा उसे दूर जंगल में ले जाकर गायब हो गया। भटकता हुआ राजा एक नगर में एक सेठ के घर पहुँचा। वहाँ दीवार की खूँटी पर टँगा हार खूँटी ने ही निगल लिया, और चोरी का दोष राजा पर लगा। उस नगर के राजा ने उसके हाथ-पैर कटवा दिए। विक्रमादित्य अपंग होकर एक तेली के यहाँ चलाने लगे।

बरसों बीते। एक रात वह राग दीपक गा रहा था। उसकी मधुर आवाज़ सुनकर उस नगर की राजकुमारी ने ठान लिया कि वह इसी से विवाह करेगी, और विवाह हो गया। उसी रात शनि देव ने सपने में दर्शन दिए और कहा — देखा, मेरा अपमान करने का फल? विक्रमादित्य ने क्षमा माँगी और विनती की — जैसा दुख मुझे दिया, वैसा किसी और को मत देना। शनि देव प्रसन्न हुए और उसके हाथ-पैर लौटा दिए।

सुबह सब हैरान थे। सेठ के घर की खूँटी ने भी हार वापस उगल दिया। सेठ ने क्षमा माँगी और अपनी बेटी का विवाह भी उससे किया। विक्रमादित्य अपनी रानियों के साथ उज्जैन लौटे और राज्य में घोषणा करवाई कि शनि देव सबसे बड़े हैं, सब श्रद्धा से उनका व्रत और पूजा करें।

आज के जीवन में सीख

विक्रमादित्य ने अपने दुख के बाद भी दूसरों के लिए दया माँगी। अपने कष्ट से दूसरों का दर्द समझना ही बड़प्पन है।

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  8. 8रविवार (सूर्य देव) व्रत कथा
  9. 9सत्यनारायण कथा — पहला और दूसरा अध्याय
  10. 10सत्यनारायण कथा — तीसरा अध्याय
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