त्योहार व्रत · अध्याय 21

निर्जला एकादशी व्रत कथा — भीमसेनी एकादशी

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अब तक की कहानी

साल की चौबीस एकादशियों में निर्जला एकादशी सबसे कठिन मानी जाती है। इसकी कथा पांडव भीम से जुड़ी है।

निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है, भीषण गर्मी के दिनों में। परंपरा के अनुसार इस दिन सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक अन्न तो क्या, जल भी नहीं पिया जाता — इसलिए नाम । भक्त विष्णु भगवान की पूजा करते हैं, और राहगीरों को पानी, शरबत, घड़े, पंखे और छाते का दान करते हैं। अगले दिन द्वादशी को पूजा और दान के बाद व्रत खोला जाता है। बीमार, बुज़ुर्ग और गर्भवती लोग अपनी सेहत के अनुसार ही व्रत रखें।

कथा के अनुसार पांडव भाइयों में युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, माता कुंती और द्रौपदी — सभी हर एकादशी का व्रत रखते थे। पर भीमसेन के लिए यह बहुत कठिन था। उनके पेट में '' नाम की अग्नि थी, इसलिए उन्हें बहुत भूख लगती थी। वे भूखे रह ही नहीं पाते थे।

एक दिन भीम दुखी होकर महर्षि वेदव्यास के पास गए। बोले — 'गुरुदेव, मेरे सब भाई एकादशी करते हैं और मुझे भी कहते हैं। मैं पूजा कर सकता हूँ, दान कर सकता हूँ, पर भूखा नहीं रह सकता। क्या मेरे लिए कोई रास्ता है?'

व्यास जी ने कहा — 'भीम, यदि तुम हर एकादशी नहीं रख सकते, तो साल में बस एक व्रत पूरी निष्ठा से रखो — ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी। उस दिन जल भी मत पीना, केवल आचमन के लिए थोड़ा जल ले सकते हो। परंपरा कहती है कि इस एक व्रत को सब एकादशियों के बराबर माना गया है।'

भीम ने बड़े साहस से यह व्रत किया। गर्मी में बिना पानी के दिन बिताना उनके जैसे बलवान के लिए भी कठिन परीक्षा थी, पर उन्होंने उसे निभाया। तभी से इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं।

आज के जीवन में सीख

व्यास जी ने भीम को डाँटा नहीं, उनकी सीमा समझकर रास्ता दिखाया। हर किसी की अपनी क्षमता है — जो कर सकते हो, उसे पूरे मन से करो।

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