त्योहार व्रत · अध्याय 24

जन्माष्टमी व्रत कथा

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जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म का पर्व है। यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध पर आधारित है।

जन्माष्टमी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है। परंपरा के अनुसार भक्त दिन भर व्रत रखते हैं, मंदिर और घर में झाँकियाँ सजाते हैं, और लड्डू गोपाल के लिए झूला सजाते हैं। आधी रात को, जब कृष्ण का जन्म माना जाता है, शंख-घंटे बजते हैं, बाल-गोपाल का दूध-दही से अभिषेक होता है, माखन-मिश्री और पंजीरी का भोग लगता है, और उसके बाद व्रत खोला जाता है। अगले दिन कई जगह दही-हांडी होती है।

मथुरा का राजा कंस बहुत अत्याचारी था। वह अपनी चचेरी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से करवाकर ख़ुद उनका रथ हाँक रहा था। तभी हुई — 'अरे मूर्ख, जिसे तू इतने प्रेम से ले जा रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरा काल बनेगा।' कंस ने तुरंत तलवार निकाल ली।

वसुदेव ने विनती की — 'देवकी को मत मारो, मैं अपनी हर संतान तुम्हें सौंप दूँगा।' कंस ने दोनों को कारागार में डाल दिया। एक-एक करके उसने देवकी के छह पुत्रों को मार डाला। सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया, जिससे बलराम जन्मे।

भाद्रपद की अंधेरी, बरसाती आधी रात को आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण प्रकट हुए। पहले उन्होंने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए, फिर साधारण शिशु बन गए। उसी पल पहरेदार गहरी नींद में सो गए और कारागार के दरवाज़े अपने आप खुल गए। वसुदेव शिशु को टोकरी में रखकर निकले। उफनती यमुना ने रास्ता दे दिया, और शेषनाग ने ऊपर से छाया की।

गोकुल में नंद बाबा के घर यशोदा ने उसी रात एक कन्या को जन्म दिया था। वसुदेव कृष्ण को वहाँ रखकर कन्या को ले आए। सुबह कंस ने कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा, पर वह हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और देवी रूप में बोली — 'तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है।' उधर गोकुल में नंदोत्सव मनाया जाने लगा।

आज के जीवन में सीख

जब सब दरवाज़े बंद लगें, तब भी भरोसा रखो — अंधेरी रात में ही कृष्ण का जन्म हुआ था। और वसुदेव की तरह, डर के बीच भी अपना कर्तव्य निभाओ।

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