मासिक व्रत · अध्याय 12

प्रदोष व्रत कथा

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अब तक की कहानी

प्रदोष व्रत हर महीने दोनों पक्षों की त्रयोदशी को भगवान शिव के लिए रखा जाता है। यह कथा एक गरीब ब्राह्मणी और एक राजकुमार की है।

परंपरा से प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। दिन भर व्रत रखकर शाम को में, यानी सूर्यास्त के आसपास, शिवजी की पूजा होती है — जल, दूध, बेलपत्र, धूप-दीप के साथ। फिर कथा सुनी जाती है। जिस वार को प्रदोष पड़ता है, उसके नाम से भी इसे पुकारते हैं, जैसे सोम प्रदोष या शनि प्रदोष।

एक नगर में एक गरीब विधवा ब्राह्मणी अपने छोटे बेटे के साथ रहती थी। वह भिक्षा माँगकर गुज़ारा करती थी। एक दिन लौटते समय उसे नदी किनारे एक घायल, रोता हुआ बालक मिला। वह विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर राज्य छीन लिया था, और माँ भी नहीं रही थी। ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई और अपने बेटे की तरह पालने लगी।

कुछ दिन बाद ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम गई। ऋषि ने राजकुमार की कहानी बताई और ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ब्राह्मणी और दोनों बालक श्रद्धा से प्रदोष व्रत करने लगे। बालक धीरे-धीरे बड़े हुए।

एक दिन दोनों युवक वन में घूम रहे थे। वहाँ उन्होंने कुछ गंधर्व कन्याओं को देखा। उनमें से एक, गंधर्व राजा की बेटी अंशुमती, राजकुमार धर्मगुप्त को देखकर उसकी ओर आकर्षित हुई। दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया। कुछ समय बाद गंधर्व राजा ने, कथा के अनुसार शिवजी की प्रेरणा से, अपनी बेटी का विवाह धर्मगुप्त से कर दिया।

गंधर्वों की सहायता से धर्मगुप्त ने विदर्भ पर फिर से अधिकार पाया और धर्म से राज करने लगा। वह उस ब्राह्मणी को कभी नहीं भूला। उसने उन्हें माँ का सम्मान दिया और उनके बेटे को अपना भाई मानकर साथ रखा।

आज के जीवन में सीख

ब्राह्मणी के पास खुद कुछ नहीं था, फिर भी उसने एक अनाथ को अपनाया। अच्छाई कभी व्यर्थ नहीं जाती, और कृतज्ञता उसे पूरा करती है।

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सभी अध्याय

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  5. 5गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत कथा
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  7. 7शनिवार (शनि देव) व्रत कथा
  8. 8रविवार (सूर्य देव) व्रत कथा
  9. 9सत्यनारायण कथा — पहला और दूसरा अध्याय
  10. 10सत्यनारायण कथा — तीसरा अध्याय
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