विद्येश्वर संहिता · अध्याय 3
शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
अब तक की कहानी
ब्रह्मा और विष्णु के सामने शिव अनंत ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए। अहंकार टूटा और दोनों ने शिव को प्रणाम किया।
ज्योति स्तंभ की घटना के बाद ब्रह्मा और विष्णु ने शिव से पूछा — प्रभु, आपकी पूजा किस रूप में की जाए? शिव ने समझाया कि उनके दो रूप हैं। एक — बिना आकार का, अनंत; और दूसरा सकल — आकार वाला, जैसे शिव का साकार रूप जिसमें जटा, त्रिशूल और डमरू हैं।
शिव बोले — जो रूप तुमने देखा, जिसका न आदि है न अंत, वही मेरा निराकार रूप है। उसका प्रतीक लिंग है। लिंग का अर्थ है चिह्न या पहचान। जैसे कोई चिह्न किसी बड़ी चीज़ की याद दिलाता है, वैसे ही शिवलिंग उस अनंत शिव की याद दिलाता है जो हर जगह है।
इसीलिए शिव मंदिरों में अधिकतर शिवलिंग की पूजा होती है, मूर्ति की कम। शिव पुराण कहता है कि लिंग रूप में पूजा करने से भक्त साकार और निराकार, दोनों रूपों की पूजा एक साथ कर लेता है।
शिव पुराण बताता है कि यह ज्योति मार्गशीर्ष महीने में आर्द्रा नक्षत्र के दिन प्रकट हुई थी। परंपरा मानती है कि जहाँ यह अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, वह स्थान आज के तमिलनाडु का अरुणाचल पर्वत है, जहाँ आज भी कार्तिक में पर्वत पर बड़ा दीप जलाया जाता है।
पूजा कैसे करें? शिव पुराण बहुत सरल रास्ता बताता है — जल या दूध से , बेलपत्र, चंदन, धूप-दीप और ॐ नमः शिवाय का जाप। महत्व चीज़ों का नहीं, भाव का है। भक्त मानते हैं कि शिव उस मन को सबसे पहले स्वीकार करते हैं जो साफ़ और सच्चा हो।
आज के जीवन में सीख
प्रतीक हमें बड़ी सच्चाई की याद दिलाते हैं। असली पूजा चीज़ों में नहीं, उस भाव में है जिसके साथ हम उन्हें अर्पित करते हैं।
सभी अध्याय
- 1शिव पुराण क्या है?
- 2अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
- 3शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
- 4सती और दक्ष का यज्ञ
- 5वीरभद्र और दक्ष के यज्ञ का विनाश
- 6तारकासुर का वरदान और कामदेव का भस्म होना
- 7पार्वती की तपस्या
- 8शिव-पार्वती विवाह
- 9कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध
- 10गणेश का जन्म और हाथी का सिर
- 11त्रिपुरासुर और एक बाण
- 12नीलकंठ — जब शिव ने विष पिया
- 13गंगा का अवतरण — शिव की जटा में
- 14मार्कंडेय और काल पर विजय
- 15किरात और अर्जुन
- 16शिव के रूप — अर्धनारीश्वर और नटराज
- 17शिकारी और पहली शिवरात्रि
- 18बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 1
- 19बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2