प्रेत खंड · अध्याय 6
ग्यारहवाँ, बारहवाँ और तेरहवाँ दिन
अब तक की कहानी
दस दिनों के पिंडदान से जाने वाले के लिए सूक्ष्म शरीर बनता है। दसवें दिन वह शरीर पूरा माना जाता है।
भगवान विष्णु ने कहा — दस दिनों के बाद भी परिवार का कर्तव्य पूरा नहीं होता। ग्यारहवें दिन श्राद्ध किया जाता है। इस दिन पिंड दिया जाता है, ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और अपनी शक्ति के अनुसार दान किया जाता है। माना जाता है कि यह जीव की आगे की यात्रा की तैयारी है।
बारहवें दिन का कर्म बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसे कहते हैं। इसमें जाने वाले के पिंड को उसके पितरों — पिता, दादा, परदादा — के पिंडों के साथ मिलाया जाता है। इसका भाव यह है कि अब वह प्रेत की अवस्था से निकलकर पितरों के समूह में शामिल हो गया।
तेरहवें दिन, पुराण के अनुसार, यमदूत जीव को लेकर यमलोक की लंबी यात्रा पर निकलते हैं। इस दिन परिवार भोजन, दान और प्रार्थना करता है, और गरुड़ पुराण का पाठ पूरा होता है। बहुत-से घरों में इसे तेरहवीं कहते हैं। यह दिन शोक के समय के पूरा होने और जीवन में फिर से लौटने का भी संकेत है।
पुराण कहता है कि इस दिन किया गया दान — जैसे छाता, जूते, वस्त्र, अन्न, जल का पात्र, दीपक — आगे की यात्रा में जीव के काम आता है। आज के समय में बहुत-से परिवार ज़रूरतमंदों को भोजन कराते हैं या किसी अच्छे काम में दान देते हैं। भाव वही है: जाने वाले के नाम से किसी का भला हो।
तेरह दिनों का यह क्रम परिवार को भी सँभालता है। पहले दिन का गहरा सदमा, फिर रोज़ के कर्मों में लगना, फिर सबका साथ बैठना — यह सब धीरे-धीरे मन को शांत करता है। परंपरा हमें अकेले शोक नहीं करने देती; वह हमें साथ बैठाती है।
आज के जीवन में सीख
शोक को भी एक रास्ता चाहिए। जाने वाले के नाम से किसी का भला करना, उसे याद करने का सबसे सुंदर तरीका है।
सभी अध्याय
- 1गरुड़ पुराण क्या है और मृत्यु के बाद क्यों पढ़ा जाता है
- 2गरुड़ जी के प्रश्न
- 3मृत्यु के समय क्या होता है
- 4शरीर छोड़ने के बाद आत्मा
- 5दस दिन का पिंडदान
- 6ग्यारहवाँ, बारहवाँ और तेरहवाँ दिन
- 7यमलोक का मार्ग और वैतरणी नदी
- 8यमराज का दरबार और चित्रगुप्त
- 9कर्म और उसका फल
- 10वे पुण्य कर्म जो साथ जाते हैं
- 11श्राद्ध और पितर
- 12प्रेत योनि और परिवार की सहायता
- 13पुनर्जन्म
- 14मोक्ष का मार्ग
- 15अच्छा जीवन कैसे जियें — गरुड़ पुराण का संदेश