प्रेत खंड · अध्याय 5
दस दिन का पिंडदान
अब तक की कहानी
शरीर छोड़ने के बाद आत्मा सूक्ष्म रूप में घर के पास रहती है और परिवार के दिए पिंड-जल से तृप्त होती है।
गरुड़ जी ने पूछा — प्रभु, मृत्यु के बाद पिंडदान क्यों किया जाता है? भगवान ने कहा — गरुड़, सूक्ष्म जीव के पास आगे की लंबी यात्रा के लिए कोई शरीर नहीं होता। परिवार जो देता है, उसी से धीरे-धीरे उसके लिए एक नया सूक्ष्म शरीर बनता है।
पुराण के अनुसार, पहले दिन के पिंड से सिर बनता है, दूसरे दिन से गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन से पीठ और पाँचवें दिन से नाभि। छठे और सातवें दिन से कमर और शरीर का निचला भाग, आठवें दिन से जाँघें और नौवें दिन से घुटने और पैर बनते हैं।
दसवें दिन, जब शरीर पूरा हो जाता है, तब जीव को तेज़ भूख और प्यास लगती है। उस दिन का पिंड उसकी भूख-प्यास शांत करता है। इसीलिए दसवाँ दिन विशेष माना जाता है, और कई परिवार इस दिन का कर्म करते हैं।
पिंड चावल या जौ के आटे, तिल, घी और जल से बनता है। पर पुराण बार-बार कहता है कि असली चीज़ है श्रद्धा। जो परिवार प्रेम और भाव से पिंड देता है, उसका पिंड जाने वाले तक पहुँचता है — चाहे वह कितना भी सादा क्यों न हो।
आज अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में ये कर्म अलग ढंग से होते हैं — कहीं दस दिन, कहीं बारह, कहीं तेरह। अपने परिवार के बड़ों और पुरोहित की परंपरा के अनुसार करें। गरुड़ पुराण का भाव इतना ही है कि जाने वाले को अकेला न छोड़ें; उसकी यात्रा में उसका साथ दें।
आज के जीवन में सीख
किसी कर्म की कीमत उसके भाव से होती है, खर्च से नहीं। सादा पर सच्चा प्रेम सबसे बड़ा अर्पण है।
सभी अध्याय
- 1गरुड़ पुराण क्या है और मृत्यु के बाद क्यों पढ़ा जाता है
- 2गरुड़ जी के प्रश्न
- 3मृत्यु के समय क्या होता है
- 4शरीर छोड़ने के बाद आत्मा
- 5दस दिन का पिंडदान
- 6ग्यारहवाँ, बारहवाँ और तेरहवाँ दिन
- 7यमलोक का मार्ग और वैतरणी नदी
- 8यमराज का दरबार और चित्रगुप्त
- 9कर्म और उसका फल
- 10वे पुण्य कर्म जो साथ जाते हैं
- 11श्राद्ध और पितर
- 12प्रेत योनि और परिवार की सहायता
- 13पुनर्जन्म
- 14मोक्ष का मार्ग
- 15अच्छा जीवन कैसे जियें — गरुड़ पुराण का संदेश