उत्तम चरित्र · अध्याय 6
धूम्रलोचन का अंत
अब तक की कहानी
शुंभ ने देवी को विवाह का संदेश भेजा। देवी ने कहा कि जो उन्हें युद्ध में जीतेगा, वही उनका पति होगा।
छठे अध्याय में दूत ने लौटकर शुंभ को देवी की बात सुनाई। शुंभ गुस्से से भर गया। उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को आदेश दिया, 'उस स्त्री को बालों से पकड़कर यहाँ ले आओ। अगर कोई उसकी रक्षा करे, तो उसे भी हरा दो।' धूम्रलोचन साठ हज़ार असुरों की सेना लेकर हिमालय पहुँचा।
धूम्रलोचन ने देवी से कहा, 'चलो, मेरे स्वामी शुंभ के पास चलो। अपने आप नहीं चलोगी तो मैं ज़बरदस्ती ले जाऊँगा।' देवी ने शांति से कहा, 'तुम्हें बड़े असुरराज ने भेजा है, तुम बलवान हो, सेना भी साथ है। अगर ज़बरदस्ती ले जाओगे, तो मैं क्या कर सकती हूँ?'
यह सुनकर धूम्रलोचन देवी की ओर दौड़ा। पर देवी ने केवल '' की — एक 'हुं' की ध्वनि — और उसी से धूम्रलोचन भस्म हो गया। उसकी सेना देवी पर बाणों और शस्त्रों से टूट पड़ी, तो देवी का सिंह गरजता हुआ कूदा और उसने पूरी असुर सेना को तितर-बितर कर दिया।
जब शुंभ ने सुना कि धूम्रलोचन एक हुंकार से ही खत्म हो गया और सेना भी हार गई, तो वह क्रोध से होंठ चबाने लगा। उसने चंड और मुंड को बुलाकर कहा, 'बड़ी सेना लेकर जाओ और उस देवी को पकड़कर लाओ। अगर न हो सके, तो उसे और उसके सिंह को युद्ध में हरा दो।'
आज के जीवन में सीख
सच्ची शक्ति को शोर मचाने की ज़रूरत नहीं होती। देवी ने बहस नहीं की — शांत रहीं, और समय आने पर एक ध्वनि ही काफ़ी थी।
सभी अध्याय
- 1राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ
- 2महिषासुर का आतंक और देवी का प्रकट होना
- 3महिषासुर का अंत
- 4देवताओं की स्तुति और देवी का वरदान
- 5शुंभ-निशुंभ और दूत का संदेश
- 6धूम्रलोचन का अंत
- 7चंड-मुंड और माँ चामुंडा
- 8रक्तबीज का अंत
- 9निशुंभ का अंत
- 10"मैं अकेली हूँ" — शुंभ का अंत
- 11नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
- 12देवी का वचन — इस कथा की महिमा
- 13सुरथ और समाधि को वरदान