उत्तम चरित्र · अध्याय 12
देवी का वचन — इस कथा की महिमा
अब तक की कहानी
देवताओं ने नारायणी स्तुति गाई और देवी ने वचन दिया कि संकट के समय वे बार-बार अवतार लेंगी।
बारहवें अध्याय में देवी स्वयं इस कथा की महिमा बताती हैं। इसे कहते हैं। देवी कहती हैं, 'जो मन लगाकर इन स्तुतियों से मेरी प्रार्थना करेगा, उसकी हर बाधा मैं दूर करूँगी। जो मधु-कैटभ, महिषासुर और शुंभ-निशुंभ के अंत की यह कथा सुनेगा, उस पर मेरी कृपा रहेगी।'
देवी के अनुसार अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को एकाग्र मन से यह माहात्म्य सुनने का विशेष महत्व है। परंपरा कहती है कि शरद ऋतु की वार्षिक महापूजा — यानी शारदीय नवरात्रि — में भक्ति से इसे सुनने पर देवी प्रसन्न होती हैं। इसीलिए नवरात्रि में घर-घर और मंदिरों में सप्तशती का पाठ होता है।
देवी आगे कहती हैं कि जहाँ यह कथा नियम से पढ़ी जाती है, उस स्थान को वे कभी नहीं छोड़तीं। भक्तों का विश्वास है कि इसके पाठ से भय दूर होता है, बुरे सपनों का असर मिटता है और मन में साहस आता है। यह सब भक्तों की आस्था और परंपरा की बात है।
इतना कहकर देवी देवताओं के देखते-देखते अंतर्धान हो गईं। सब देवता निर्भय होकर अपने-अपने स्थान पर लौट गए और फिर से अपना काम सँभाला। मेधा ऋषि ने कहा, 'राजन, वही देवी बार-बार प्रकट होकर संसार की रक्षा करती हैं। वही संसार को रचती हैं, और प्रसन्न होने पर वही ज्ञान और कृपा देती हैं।'
आज के जीवन में सीख
पाठ का असली फल मन का बदलना है। जब हम रोज़ कुछ समय अच्छी बातें पढ़ते और सुनते हैं, तो डर कम होता है और साहस बढ़ता है।
सभी अध्याय
- 1राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ
- 2महिषासुर का आतंक और देवी का प्रकट होना
- 3महिषासुर का अंत
- 4देवताओं की स्तुति और देवी का वरदान
- 5शुंभ-निशुंभ और दूत का संदेश
- 6धूम्रलोचन का अंत
- 7चंड-मुंड और माँ चामुंडा
- 8रक्तबीज का अंत
- 9निशुंभ का अंत
- 10"मैं अकेली हूँ" — शुंभ का अंत
- 11नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
- 12देवी का वचन — इस कथा की महिमा
- 13सुरथ और समाधि को वरदान