उत्तम चरित्र · अध्याय 13
सुरथ और समाधि को वरदान
अब तक की कहानी
मेधा ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य को देवी की पूरी कथा सुना दी — मधु-कैटभ, महिषासुर और शुंभ-निशुंभ के अंत तक।
तेरहवें और अंतिम अध्याय में मेधा ऋषि कथा पूरी करते हुए कहते हैं, 'राजन, यही देवी का उत्तम माहात्म्य है। उन्हीं की माया से तुम, यह वैश्य और दूसरे ज्ञानी लोग भी मोह में पड़ते हैं। तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वही भोग, स्वर्ग और मोक्ष देती हैं।'
ऋषि की बात सुनकर राजा सुरथ और समाधि ने उन्हें प्रणाम किया और नदी के किनारे तपस्या करने चले गए। वहाँ उन्होंने मिट्टी की देवी की मूर्ति बनाई और फूल, धूप, दीप और जल से उनकी पूजा की। वे कभी उपवास करते, कभी थोड़ा-सा भोजन करते, और मन को देवी में लगाए रहते।
तीन वर्ष तक इसी तरह करने पर जगत की माता चंडिका प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुईं और बोलीं, 'तुम दोनों जो माँगना चाहो, माँगो।' राजा ने इस जन्म में अपना राज्य वापस माँगा, जो शत्रु न छीन सकें, और अगले जन्म में ऐसा राज्य जो कभी नष्ट न हो।
देवी ने कहा, 'कुछ ही दिनों में तुम शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा लोगे। और अगले जन्म में तुम सूर्यदेव के पुत्र बनकर सावर्णि के नाम से जाने जाओगे।' समाधि का मन संसार से हट चुका था। उन्होंने वह ज्ञान माँगा जो 'मैं' और 'मेरा' का मोह मिटा दे।
देवी ने समाधि से कहा, 'तुम्हें वह ज्ञान मिलेगा जिससे तुम मुक्त हो जाओगे।' इतना कहकर देवी अंतर्धान हो गईं। इस प्रकार दुर्गा सप्तशती पूरी होती है — एक ने संसार में धर्म से राज करने का वर पाया, और दूसरे ने संसार से ऊपर उठने का ज्ञान। देवी दोनों तरह के भक्तों की माँ हैं।
आज के जीवन में सीख
दोनों ने अलग-अलग चीज़ें माँगीं, और देवी ने दोनों को दिया। ईश्वर हमें वहीं से मिलते हैं जहाँ हम खड़े हैं — बस सच्चे मन से माँगना चाहिए।
सभी अध्याय
- 1राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ
- 2महिषासुर का आतंक और देवी का प्रकट होना
- 3महिषासुर का अंत
- 4देवताओं की स्तुति और देवी का वरदान
- 5शुंभ-निशुंभ और दूत का संदेश
- 6धूम्रलोचन का अंत
- 7चंड-मुंड और माँ चामुंडा
- 8रक्तबीज का अंत
- 9निशुंभ का अंत
- 10"मैं अकेली हूँ" — शुंभ का अंत
- 11नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
- 12देवी का वचन — इस कथा की महिमा
- 13सुरथ और समाधि को वरदान