सरस्वती चालीसा — अर्थ सहित
सरस्वती चालीसा विद्या, वाणी और कला की देवी माँ सरस्वती की स्तुति है। इसमें बताया गया है कि वाल्मीकि, कालिदास, तुलसी और सूर जैसे कवियों ने माँ की कृपा से ही यश पाया। अंत में रामसागर का नाम आता है। बसंत पंचमी पर और पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
॥ दोहा ॥
जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
॥ दोहा ॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥
॥ चौपाई ॥
रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
॥ चौपाई ॥
जग में पाप बुद्धि जब होती। तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥
॥ चौपाई ॥
तब ही मातु का निज अवतारी। पाप हीन करती महतारी॥
॥ चौपाई ॥
वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥
॥ चौपाई ॥
रामचरित जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥
॥ चौपाई ॥
कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
॥ चौपाई ॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥
॥ चौपाई ॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥
॥ चौपाई ॥
करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥
॥ चौपाई ॥
पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥
॥ चौपाई ॥
राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥
॥ चौपाई ॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
॥ चौपाई ॥
मधुकैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
॥ चौपाई ॥
समर हजार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥
॥ चौपाई ॥
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
॥ चौपाई ॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
॥ चौपाई ॥
चंड मुण्ड जो थे विख्याता। क्षण महु संहारे उन माता॥
॥ चौपाई ॥
रक्त बीज से समरथ पापी। सुरमुनि हृदय धरा सब काँपी॥
॥ चौपाई ॥
काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। बारबार बिनवउं जगदंबा॥
॥ चौपाई ॥
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा। क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥
॥ चौपाई ॥
भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥
॥ चौपाई ॥
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥
॥ चौपाई ॥
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
॥ चौपाई ॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥
॥ चौपाई ॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
॥ चौपाई ॥
नृप कोपित को मारन चाहे। कानन में घेरे मृग नाहे॥
॥ चौपाई ॥
सागर मध्य पोत के भंजे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
॥ चौपाई ॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥
॥ चौपाई ॥
नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करई न कोई॥
॥ चौपाई ॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥
॥ चौपाई ॥
करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
॥ चौपाई ॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥
॥ चौपाई ॥
भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥
॥ चौपाई ॥
बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥
॥ चौपाई ॥
रामसागर बाँधि हेतु भवानी। कीजै कृपा दास निज जानी॥
॥ दोहा ॥
मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप। डूबन से रक्षा करहु, परूँ न मैं भव कूप॥
॥ दोहा ॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु। राम सागर अधम को, आश्रय तू ही देदातु॥
अर्थ
दोहा
जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
माता-पिता के चरण-कमलों की धूल अपने माथे पर लगाकर मैं माँ सरस्वती को प्रणाम करता हूँ; हे दाता, मुझे बुद्धि और बल दीजिए।
दोहा
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥
आपकी अपार और अनंत महिमा पूरे जगत में फैली है; हे माँ, अब आप ही बुरे लोगों के पापों का नाश कीजिए।
चौपाई 1
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
हे सारी बुद्धि और बल का भंडार माँ, आपकी जय हो; हे सब कुछ जानने वाली, अमर और अविनाशी माँ, आपकी जय हो।
चौपाई 2
जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥
हाथ में वीणा धारण करने वाली माँ, आपकी जय हो; आप सदा सुंदर हंस पर सवारी करती हैं।
चौपाई 3
रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
हे चार भुजाओं वाली माँ, आप सारे विश्व में प्रसिद्ध हैं।
चौपाई 4
जग में पाप बुद्धि जब होती। तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥
जब संसार में बुरी सोच बढ़ जाती है, तब धर्म की ज्योति फीकी पड़ जाती है।
चौपाई 5
तब ही मातु का निज अवतारी। पाप हीन करती महतारी॥
तब माँ स्वयं अवतार लेकर संसार को पाप से मुक्त करती हैं।
चौपाई 6
वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥
वाल्मीकि जी पहले हिंसक डाकू थे; आपकी कृपा से उन्हें सारा संसार जानता है।
चौपाई 7
रामचरित जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥
उन्होंने रामायण की रचना की और 'आदि कवि' की उपाधि पाई।
चौपाई 8
कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
कालिदास जो इतने प्रसिद्ध हुए, वह भी हे माँ, आपकी कृपा दृष्टि से ही हुआ।
चौपाई 9
तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥
तुलसीदास, सूरदास और ऐसे ही कई विद्वान और ज्ञानी हुए,
चौपाई 10
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥
उनका और कोई सहारा नहीं था; हे माँ, केवल आपकी कृपा ही उनका सहारा थी।
चौपाई 11
करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥
हे माँ भवानी, मुझ दुखी और दीन को अपना सेवक जानकर वैसी ही कृपा कीजिए।
चौपाई 12
पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥
बेटा बहुत सी गलतियाँ करता है, पर माँ उन्हें मन में नहीं रखती।
चौपाई 13
राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥
हे माँ, अब मेरी लाज रखिए; मैं कई तरह से आपकी विनती करता हूँ।
चौपाई 14
मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
मैं अनाथ हूँ, मुझे बस आपका सहारा है; हे जगदम्बा, कृपा कीजिए, आपकी जय हो।
चौपाई 15
मधुकैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
मधु और कैटभ नाम के बहुत बलवान असुरों ने विष्णु से बाहु-युद्ध छेड़ा।
चौपाई 16
समर हजार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥
पाँच हज़ार वर्षों तक भयंकर युद्ध चला, फिर भी वे पीछे नहीं हटे।
चौपाई 17
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
तब माँ ने सहायता की, और उन दुष्टों की बुद्धि उलटी हो गई।
चौपाई 18
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
इसी से उन दुष्टों की मृत्यु हुई; हे माँ, मेरी इच्छा भी पूरी कीजिए।
चौपाई 19
चंड मुण्ड जो थे विख्याता। क्षण महु संहारे उन माता॥
चंड और मुंड जैसे प्रसिद्ध असुरों को माँ ने क्षण भर में मार डाला।
चौपाई 20
रक्त बीज से समरथ पापी। सुरमुनि हृदय धरा सब काँपी॥
रक्तबीज जैसे शक्तिशाली पापी से देवता, मुनि और सारी धरती काँप उठी थी।
चौपाई 21
काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। बारबार बिनवउं जगदंबा॥
माँ ने उसका सिर ऐसे काटा जैसे केले का तना; हे जगदम्बा, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ।
चौपाई 22
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा। क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥
संसार में प्रसिद्ध शुंभ और निशुंभ को भी हे माँ, आपने क्षण भर में वश में कर लिया।
चौपाई 23
भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥
आपने भरत की माता कैकेयी की बुद्धि फेरी, जिससे श्रीराम को वनवास हुआ।
चौपाई 24
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥
इस तरह आपने रावण के वध का मार्ग बनाया और देवता, मनुष्य और मुनि सबको सुख दिया।
चौपाई 25
को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥
आपका यश और गुण गाने में कौन समर्थ है? वेदों ने आपको अनादि और अनंत बताया है।
चौपाई 26
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
विष्णु और रुद्र भी आपके यश का पूरा वर्णन नहीं कर पाते, जिनकी आप स्वयं रक्षा करती हैं।
चौपाई 27
रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥
रक्तदंतिका और शताक्षी — असुरों का नाश करने वाली माँ, आपके अनगिनत नाम हैं।
चौपाई 28
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
आपने धरती पर कठिन से कठिन काम किए, इसलिए सारा जगत आपको दुर्गा नाम से पुकारता है।
चौपाई 29
दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
हे माँ, आप कठिनाइयों को हरने वाली हैं; हे सुख देने वाली, जब-जब पुकारूँ, कृपा कीजिए।
चौपाई 30
नृप कोपित को मारन चाहे। कानन में घेरे मृग नाहे॥
जब क्रोधित राजा किसी को मारना चाहे, या जंगल में शेर घेर ले,
चौपाई 31
सागर मध्य पोत के भंजे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
जब समुद्र के बीच तूफ़ान में नाव टूट जाए और कोई साथी न हो,
चौपाई 32
भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥
भूत-प्रेत की बाधा हो, दुख हो, गरीबी हो या कोई संकट,
चौपाई 33
नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करई न कोई॥
माँ का नाम जपने से सब मंगल होता है — इसमें कोई संदेह न करे, ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 34
पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥
जो संतान के लिए व्याकुल हैं, वे और सब छोड़कर इसी तरह माँ की पूजा करें।
चौपाई 35
करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
जो रोज़ यह चालीसा पढ़ता है, उसे सुंदर और गुणी संतान का आशीर्वाद मिलता है — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 36
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥
जो धूप आदि और भोग चढ़ाता है, वह संकटों से मुक्त होता है — ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 37
भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥
जो हमेशा माँ की भक्ति करते हैं, उनके पास कष्ट नहीं आते।
चौपाई 38
बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥
जो बंदी सौ बार इसका पाठ करे, उसके सारे बंधन छूट जाते हैं — ऐसा चालीसा में कहा गया है।
चौपाई 39
रामसागर बाँधि हेतु भवानी। कीजै कृपा दास निज जानी॥
हे भवानी, बंधनों में बँधे रामसागर को अपना दास जानकर कृपा कीजिए।
दोहा
मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप। डूबन से रक्षा करहु, परूँ न मैं भव कूप॥
हे माँ, आपकी चमक सूर्य जैसी है और मैं अंधकार जैसा हूँ; मुझे डूबने से बचाइए ताकि मैं संसार के कुएँ में न गिरूँ।
दोहा
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु। राम सागर अधम को, आश्रय तू ही देदातु॥
हे माँ सरस्वती, सुनिए — मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए। इस अधम रामसागर को आप ही सहारा दीजिए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सरस्वती चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
बसंत पंचमी माँ सरस्वती का मुख्य पर्व है, उस दिन इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। बहुत से विद्यार्थी रोज़ सुबह पढ़ाई शुरू करने से पहले, या परीक्षा के दिनों में भी इसका पाठ करते हैं। गुरुवार को भी कई लोग पढ़ते हैं।
सरस्वती चालीसा का पाठ कैसे करें?
स्नान के बाद माँ के चित्र के सामने दीप जलाएँ, सफ़ेद या पीले फूल चढ़ाएँ, और अपनी किताबें या वाद्य पास रखकर शांत मन से पाठ करें। पाठ के बाद कुछ देर पढ़ाई या अभ्यास करना अच्छी परंपरा है।
क्या सरस्वती चालीसा पढ़ने से पढ़ाई में मदद मिलती है?
भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर मन एकाग्र होता है और माँ की कृपा से बुद्धि खुलती है। पर यह मेहनत की जगह नहीं लेता — परंपरा कहती है कि माँ उन्हीं की मदद करती हैं जो लगन से सीखते हैं।