हनुमान चालीसा — अर्थ सहित

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अवधी में रचित हनुमान जी की स्तुति। मंगलवार और शनिवार को पाठ करना शुभ माना जाता है।

40 चौपाई · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥

॥ दोहा ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

॥ चौपाई ॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

॥ चौपाई ॥

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

॥ चौपाई ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

॥ चौपाई ॥

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

॥ चौपाई ॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

॥ चौपाई ॥

संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥

॥ चौपाई ॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

॥ चौपाई ॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

॥ चौपाई ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

॥ चौपाई ॥

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

॥ चौपाई ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

॥ चौपाई ॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

॥ चौपाई ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

॥ चौपाई ॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

॥ चौपाई ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

॥ चौपाई ॥

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

॥ चौपाई ॥

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

॥ चौपाई ॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

॥ चौपाई ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥

॥ चौपाई ॥

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

॥ चौपाई ॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

॥ चौपाई ॥

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

॥ चौपाई ॥

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

॥ चौपाई ॥

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

॥ चौपाई ॥

और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥

॥ चौपाई ॥

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

॥ चौपाई ॥

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

॥ चौपाई ॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

॥ चौपाई ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

॥ चौपाई ॥

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

॥ चौपाई ॥

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥

॥ चौपाई ॥

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

॥ चौपाई ॥

जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

॥ चौपाई ॥

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

॥ चौपाई ॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

॥ चौपाई ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

॥ दोहा ॥

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमान चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

हनुमान चालीसा किसी भी समय पढ़ी जा सकती है। परंपरा से मंगलवार और शनिवार, और सुबह या शाम स्नान के बाद पाठ करना शुभ माना जाता है।

हनुमान चालीसा कितनी बार पढ़ें?

एक बार भी पूरे मन से पढ़ना काफ़ी है। कई लोग 7, 11 या 108 बार पाठ करते हैं; चालीसा में स्वयं 100 बार पाठ का उल्लेख है।

क्या महिलाएँ हनुमान चालीसा पढ़ सकती हैं?

हाँ। हनुमान चालीसा का पाठ कोई भी कर सकता है — स्त्री, पुरुष, बच्चे और बुज़ुर्ग।

हनुमान चालीसा किसने लिखी?

गोस्वामी तुलसीदास ने, 16वीं सदी में, अवधी भाषा में।

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