श्वेताश्वतर उपनिषद · अध्याय 14
एक ही देव, सबके भीतर छिपा
अब तक की कहानी
मैत्रेयी ने धन के बदले आत्मज्ञान माँगा। हमारी यात्रा के अंतिम अध्याय में श्वेताश्वतर उपनिषद ज्ञान को भक्ति से जोड़ता है।
श्वेताश्वतर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से है और इसका नाम उस ऋषि के नाम पर है जिन्होंने यह ज्ञान दिया — ऋषि श्वेताश्वतर। इसकी शुरुआत कुछ ब्रह्मवादी लोगों के प्रश्नों से होती है: इस संसार का कारण क्या है? हम कहाँ से पैदा हुए? किससे जीते हैं? कहाँ टिके हैं? क्या काल (समय) कारण है? स्वभाव? भाग्य? संयोग? या पंचभूत?
उन्होंने केवल बहस नहीं की — ध्यान किया। और ध्यान में उन्होंने देखा कि सबके पीछे परमेश्वर की अपनी शक्ति है, जो उसके गुणों में छिपी हुई है। वही एक सब कारणों का कारण है। यह उपनिषद ब्रह्म को एक ऐसे ईश्वर के रूप में भी देखता है जिससे प्रेम किया जा सके — जिसे यहाँ रुद्र, शिव और महेश्वर कहा गया है।
ईश्वर हमारे भीतर कैसे छिपा है? उपनिषद सुंदर उदाहरण देता है — जैसे तिल में तेल, दही में घी, सोते में पानी, और की लकड़ी में आग छिपी रहती है। तिल को पेरने से तेल निकलता है, लकड़ी को रगड़ने से आग प्रकट होती है। वैसे ही सत्य और तप से साधना करने पर वह अपने भीतर ही प्रकट होता है।
इसी उपनिषद में वह पुकार है जिसे स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो की विश्व धर्म महासभा में दोहराया — 'शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः' — सुनो, हे अमृत के पुत्रों! यानी हम पापी या कमज़ोर नहीं, अमरता की संतान हैं। ऋषि कहते हैं, 'मैंने उस महान पुरुष को जान लिया है, जो सूर्य के समान तेजस्वी और अंधकार से परे है।'
उपनिषद के अंत में एक बहुत प्रिय बात है — ये गहरी बातें उसी के हृदय में प्रकाशित होती हैं जिसकी ईश्वर में परम है, और जैसी ईश्वर में, वैसी ही गुरु में। इस तरह उपनिषदों की यात्रा यहाँ आकर ज्ञान और भक्ति को एक कर देती है — वही मार्ग जो आगे भगवद गीता में और खुलकर सामने आता है।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा
एक ही देव सब प्राणियों में छिपा है — वह सर्वव्यापी है और सब प्राणियों की अंतरात्मा है।
— श्वेताश्वतर उपनिषद 6.11
आज के जीवन में सीख
तुम अमृत की संतान हो — कमज़ोर नहीं। जैसे लकड़ी में आग छिपी है, वैसे ही तुम्हारे भीतर की अच्छाई सही प्रयास से प्रकट होती है।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा