केन उपनिषद · अध्याय 2

यक्ष और देवताओं का अहंकार

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अब तक की कहानी

ईशावास्य ने सिखाया कि सब कुछ ईश्वर से भरा है। अब केन उपनिषद पूछता है — हमारी आँख, कान और मन को चलाने वाला कौन है?

केन उपनिषद सामवेद से है। इसका नाम इसके पहले शब्द 'केन' से पड़ा, जिसका अर्थ है 'किसके द्वारा?' शिष्य पूछता है — किसकी प्रेरणा से मन विषयों की ओर दौड़ता है? किसके कहने पर प्राण चलता है, वाणी बोलती है, आँख देखती है और कान सुनते हैं? गुरु उत्तर देते हैं — वह कान का कान, मन का मन और आँख की आँख है। आँख उसे नहीं देख सकती, क्योंकि उसी से आँख देखती है।

फिर एक कथा आती है। एक बार ने देवताओं के लिए असुरों पर विजय दिलाई। पर देवता सोचने लगे — यह जीत तो हमारी है, यह महिमा हमारी है। ब्रह्म ने उनका घमंड जान लिया और उनके सामने एक रहस्यमय के रूप में प्रकट हुआ। देवता समझ नहीं पाए कि यह कौन है।

देवताओं ने अग्निदेव से कहा — जाकर पता करो। अग्नि गए। यक्ष ने पूछा, 'तुम कौन हो?' अग्नि बोले, 'मैं अग्नि हूँ, जातवेदा हूँ। धरती पर जो कुछ है, सब जला सकता हूँ।' यक्ष ने उनके सामने घास का एक तिनका रखा — 'इसे जलाओ।' अग्नि ने पूरी शक्ति लगा दी, पर तिनका नहीं जला। वे लज्जित होकर लौट आए।

फिर वायुदेव गए और बोले, 'मैं वायु हूँ, धरती पर जो कुछ है, सब उड़ा सकता हूँ।' यक्ष ने वही तिनका रखा। वायु पूरा ज़ोर लगाकर भी उसे हिला न सके। अंत में देवराज इंद्र स्वयं गए। पर जैसे ही वे पास पहुँचे, यक्ष अदृश्य हो गया।

उसी आकाश में इंद्र को एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी स्त्री दिखीं — हिमालय की पुत्री उमा हैमवती। इंद्र ने पूछा, 'वह यक्ष कौन था?' उमा ने कहा, 'वह ब्रह्म था। उसी की विजय में तुम अपनी महिमा मान रहे थे।' तब देवताओं ने समझा कि उनकी हर शक्ति ब्रह्म की ही दी हुई है। कहते हैं इसीलिए अग्नि, वायु और इंद्र देवताओं में श्रेष्ठ हुए, क्योंकि वे ब्रह्म के सबसे निकट पहुँचे।

आज के जीवन में सीख

हमारी हर प्रतिभा और हर ताक़त किसी बड़ी शक्ति की देन है। सफलता मिले तो धन्यवाद दें, घमंड नहीं।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 5 मिनटनचिकेता और यमराज: तीन वरदान

सभी अध्याय

  1. 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
  2. 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
  3. 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
  4. 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
  5. 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
  6. 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
  7. 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
  8. 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
  9. 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
  10. 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
  11. 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
  12. 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
  13. 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
  14. 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा

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