कठ उपनिषद · अध्याय 4
श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
अब तक की कहानी
नचिकेता ने यमराज के सारे लालच ठुकरा दिए और मृत्यु का रहस्य पूछा। प्रसन्न होकर यमराज अब उसे आत्मा का ज्ञान देते हैं।
यमराज ने पहली बात कही — जीवन में दो रास्ते हमेशा सामने आते हैं: और । श्रेय वह है जो सचमुच भला है, और प्रेय वह जो अभी अच्छा लगता है। दोनों मनुष्य को अपनी ओर खींचते हैं। बुद्धिमान दोनों को परखकर श्रेय चुनता है; नासमझ सुख-सुविधा के लालच में प्रेय चुन लेता है। 'नचिकेता, तुमने प्रेय को ठुकराया है, इसलिए तुम इस ज्ञान के योग्य हो।'
फिर यमराज ने नचिकेता के प्रश्न का उत्तर दिया। आत्मा न जन्म लेता है, न मरता है। वह किसी से पैदा नहीं हुआ, न उससे कुछ पैदा हुआ। वह अजन्मा, नित्य और सनातन है — शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मरता। जो सोचता है 'मैंने मारा' या 'मैं मारा गया', दोनों ही सच नहीं जानते। यह भाव आगे भगवद गीता में भी लगभग इन्हीं शब्दों में आता है।
पर यह आत्मा कैसे जाना जाए? इसके लिए यमराज ने एक सुंदर उदाहरण दिया — रथ का। आत्मा को रथ का स्वामी समझो, शरीर को रथ। बुद्धि सारथी है और मन लगाम। इंद्रियाँ — आँख, कान, जीभ आदि — घोड़े हैं, और संसार की चीज़ें वे रास्ते हैं जिन पर ये घोड़े दौड़ते हैं।
अब सोचिए: अगर सारथी (बुद्धि) सोया हुआ हो और लगाम (मन) ढीली हो, तो घोड़े (इंद्रियाँ) जिधर मन करे भागेंगे और रथ खाई में गिरेगा। पर अगर सारथी जागरूक हो और लगाम कसकर पकड़े, तो वही घोड़े रथ को मंज़िल तक ले जाते हैं। यानी इंद्रियाँ बुरी नहीं हैं — बस उन्हें सही दिशा चाहिए।
यमराज ने पुकारकर कहा — उठो, जागो, और श्रेष्ठ गुरुओं के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। ज्ञानी कहते हैं कि यह मार्ग छुरे की धार जैसा तीखा है, उस पर चलना कठिन है। इसी मंत्र को स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए अपना प्रिय संदेश बनाया।
अंत में कठ उपनिषद बताता है कि नचिकेता ने यमराज से यह विद्या और योग की पूरी विधि पाई, और वह सब बुराइयों और मृत्यु के भय से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त हुआ। जो भी इसी तरह अपने आत्मा को जानता है, वह भी ऐसा ही हो जाता है।
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
आत्मा को रथ का स्वामी जानो और शरीर को रथ। बुद्धि को सारथी जानो और मन को लगाम।
— कठ उपनिषद 1.3.3
आज के जीवन में सीख
हर दिन हमें श्रेय और प्रेय में से चुनना पड़ता है — पढ़ाई या फ़ोन, सच या आसान झूठ। बुद्धि को सारथी बनाओ, इंद्रियों को नहीं।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा