तैत्तिरीय उपनिषद · अध्याय 9
गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
अब तक की कहानी
भृगु ने पाँच बार तप करके जाना कि आनंद ही ब्रह्म है। तैत्तिरीय उपनिषद के पहले भाग में एक और अनमोल प्रसंग है — पढ़ाई पूरी होने पर गुरु का संदेश।
तैत्तिरीय उपनिषद के पहले भाग को 'शिक्षा वल्ली' कहते हैं। प्राचीन में शिष्य वर्षों तक गुरु के साथ रहकर वेद पढ़ते थे। जब पढ़ाई पूरी होती और शिष्य घर लौटने को होता, तब गुरु उसे जीवन के लिए कुछ उपदेश देते थे। ये उपदेश आज भी कई विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोहों में पढ़े जाते हैं।
गुरु कहते हैं — सत्य बोलो। धर्म का पालन करो। स्वाध्याय, यानी अपनी पढ़ाई और चिंतन, में कभी आलस्य मत करो। सत्य से मत भटको, धर्म से मत भटको, भलाई के काम से मत चूको। सोचिए, पढ़ाई ख़त्म होने के दिन गुरु कह रहे हैं — 'पढ़ना मत छोड़ना।' यानी सीखना कभी ख़त्म नहीं होता।
फिर वे प्रसिद्ध वचन आते हैं: माता को देवता मानो। पिता को देवता मानो। आचार्य (गुरु) को देवता मानो। अतिथि को देवता मानो। 'अतिथि देवो भव' आज भारत के पर्यटन का संदेश भी है। इसका अर्थ है कि जिनसे हमें जीवन, संस्कार, ज्ञान और संगति मिलती है, वे सब सम्मान के योग्य हैं।
गुरु एक बहुत ईमानदार बात भी कहते हैं — 'हमारे जो अच्छे आचरण हैं, केवल उन्हीं का पालन करना, दूसरों का नहीं।' यानी गुरु भी मानते हैं कि वे पूर्ण नहीं हैं; शिष्य को अच्छाई चुनकर अपनानी है, आँख मूँदकर नकल नहीं करनी। और अगर कभी किसी काम या आचरण पर संदेह हो, तो वैसे ही करना जैसे विचारशील, धर्मनिष्ठ और कोमल स्वभाव वाले ज्ञानी लोग करते हैं।
दान के बारे में भी सुंदर बातें हैं — श्रद्धा से दो, बिना श्रद्धा के मत दो। खुले हाथ से दो, विनम्रता से दो, समझदारी से दो। इसी उपनिषद में प्रसिद्ध शांति मंत्र 'ॐ सह नाववतु' भी आता है, जिसमें गुरु और शिष्य मिलकर प्रार्थना करते हैं — हम दोनों साथ पढ़ें, हमारी पढ़ाई तेजस्वी हो, और हम कभी एक-दूसरे से द्वेष न करें।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥
माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो, गुरु को देवता मानो, अतिथि को देवता मानो।
— तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षा वल्ली 1.11
आज के जीवन में सीख
डिग्री मिलने के बाद भी सीखते रहो। अच्छाई जहाँ से भी मिले, चुनकर अपनाओ — और माता-पिता, गुरु और मेहमान का आदर कभी मत भूलो।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा