श्री राम रक्षा स्तोत्र — अर्थ सहित
श्री राम रक्षा स्तोत्र बुधकौशिक ऋषि की संस्कृत रचना है। परंपरा कहती है कि भगवान शिव ने इसे स्वप्न में बताया और ऋषि ने सुबह उठकर लिख लिया। इसमें श्रीराम के अलग-अलग नामों से शरीर के हर अंग की रक्षा की प्रार्थना है। इसे रोज़ सुबह-शाम और रामनवमी पर विशेष रूप से पढ़ा जाता है।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषिः। श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। अनुष्टुप् छन्दः। सीता शक्तिः। श्रीमद्हनुमान् कीलकम्। श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥५॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥६॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥१०॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥११॥
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥१२॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥१३॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥१४॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥१५॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः॥१६॥
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥१७॥
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥१९॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥२०॥
संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥२१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥२२॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥२३॥
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥२४॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः॥२५॥
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥२६॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२७॥
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥२८॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥२९॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर् नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥३१॥
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥३२॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥३३॥
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्। आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥३४॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥३५॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्। तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥३६॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥३७॥
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥३८॥
अर्थ
पद 1
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य। बुधकौशिक ऋषिः। श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। अनुष्टुप् छन्दः। सीता शक्तिः। श्रीमद्हनुमान् कीलकम्। श्रीसीतारामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः॥
विनियोग: इस राम रक्षा स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्री सीता-रामचंद्र हैं, छंद अनुष्टुप है, शक्ति सीता जी हैं और कीलक हनुमान जी हैं। इसका जप श्री सीता-राम की प्रसन्नता के लिए किया जाता है।
पद 2
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्॥
ध्यान: घुटनों तक लंबी भुजाओं वाले, धनुष-बाण लिए, पद्मासन में बैठे, पीले वस्त्र पहने, नए कमल की पंखुड़ी जैसी आँखों वाले, प्रसन्न, बादल जैसे श्याम, आभूषणों से चमकते, जटा धारण किए श्रीराम का ध्यान करें, जिनकी आँखें बाईं गोद में बैठी सीता जी के मुख-कमल को निहार रही हैं।
पद 3
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्॥१॥
श्री रघुनाथ जी का चरित्र सौ करोड़ श्लोकों जितना विशाल है, और उसका एक-एक अक्षर मनुष्य के बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाला है।
पद 4
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्॥२॥
नीले कमल जैसे श्याम, कमल-नयन, सीता और लक्ष्मण के साथ, जटाओं के मुकुट से सुशोभित श्रीराम का ध्यान करके —
पद 5
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्॥३॥
जो तलवार, तरकश, धनुष और बाण लिए हैं, राक्षसों का अंत करने वाले हैं, और जो अजन्मे सर्वव्यापक प्रभु होकर भी संसार की रक्षा के लिए अपनी लीला से प्रकट हुए —
पद 6
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः॥४॥
समझदार व्यक्ति पापों को नष्ट करने वाली और शुभ इच्छाएँ पूरी करने वाली इस राम रक्षा का पाठ करे। राघव मेरे सिर की और दशरथ-पुत्र मेरे माथे की रक्षा करें।
पद 7
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः॥५॥
कौसल्या-नंदन मेरी आँखों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञ के रक्षक मेरी नाक की, और लक्ष्मण पर स्नेह रखने वाले राम मेरे मुख की रक्षा करें।
पद 8
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः॥६॥
विद्या के भंडार मेरी जीभ की, भरत जिन्हें प्रणाम करते हैं वे मेरे गले की, दिव्य अस्त्रों वाले मेरे कंधों की, और शिव-धनुष तोड़ने वाले मेरी भुजाओं की रक्षा करें।
पद 9
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः॥७॥
सीतापति मेरे हाथों की, परशुराम को जीतने वाले मेरे हृदय की, खर का नाश करने वाले मेरे शरीर के मध्य भाग की, और जाम्बवान के आश्रय मेरी नाभि की रक्षा करें।
पद 10
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्॥८॥
सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की, हनुमान के प्रभु मेरे कूल्हों की, और राक्षस-कुल का नाश करने वाले रघुश्रेष्ठ मेरी जाँघों की रक्षा करें।
पद 11
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः॥९॥
सेतु बनाने वाले मेरे घुटनों की, रावण का अंत करने वाले मेरी पिंडलियों की, विभीषण को राज्य देने वाले मेरे पैरों की, और श्रीराम मेरे पूरे शरीर की रक्षा करें।
पद 12
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्॥१०॥
जो पुण्यात्मा राम के बल से भरी इस रक्षा का पाठ करता है, परंपरा कहती है कि वह लंबी आयु वाला, सुखी, संतान वाला, विजयी और विनम्र होता है।
पद 13
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः॥११॥
पाताल, धरती और आकाश में घूमने वाले और छिपकर चलने वाले दुष्ट जीव, राम-नाम से रक्षित व्यक्ति को देख भी नहीं सकते।
पद 14
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥१२॥
जो 'राम', 'रामभद्र' या 'रामचंद्र' कहकर स्मरण करता है, वह पापों से नहीं बँधता और सांसारिक सुख तथा मोक्ष दोनों पाता है।
पद 15
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः॥१३॥
संसार को जीतने वाले एकमात्र मंत्र, राम-नाम से रक्षित इस स्तोत्र को जो कंठ में धारण करता (याद रखता) है, सारी सिद्धियाँ मानो उसके हाथ में होती हैं।
पद 16
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्॥१४॥
'वज्रपंजर' नाम के इस राम-कवच का जो स्मरण करता है, उसकी बात कहीं नहीं टलती और वह हर जगह विजय और मंगल पाता है।
पद 17
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः॥१५॥
भगवान शिव ने स्वप्न में यह राम रक्षा जैसे बताई, बुधकौशिक ऋषि ने सुबह जागकर उसे वैसे ही लिख दिया।
पद 18
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम्। अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः॥१६॥
जो इच्छा पूरी करने वाले कल्पवृक्षों के बगीचे जैसे हैं, सब विपत्तियों का अंत हैं, और तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं — वे श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं।
पद 19
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ। पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ॥१७॥
युवा, सुंदर, कोमल और महाबली, कमल जैसी बड़ी आँखों वाले, वल्कल और काले मृगचर्म के वस्त्र पहने —
पद 20
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ॥१८॥
फल और कंद-मूल खाने वाले, संयमी, तपस्वी और ब्रह्मचारी — ये दशरथ के पुत्र, दोनों भाई राम और लक्ष्मण —
पद 21
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्। रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ॥१९॥
सब प्राणियों को शरण देने वाले, सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, राक्षस-कुल का नाश करने वाले — वे दोनों रघुवंशी हमारी रक्षा करें।
पद 22
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ। रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम्॥२०॥
धनुष चढ़ाए, बाण पर हाथ रखे, कभी खाली न होने वाले तरकश लिए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए रास्ते में सदा मेरे आगे-आगे चलें।
पद 23
संनद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा। गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः॥२१॥
हर समय तैयार, कवच पहने, तलवार और धनुष-बाण लिए युवा राम, लक्ष्मण के साथ, हमारे मनोरथ बनकर आगे चलते हुए हमारी रक्षा करें।
पद 24
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली। काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः॥२२॥
राम, दशरथ-पुत्र, वीर, लक्ष्मण जिनके साथ चलते हैं, बलवान, ककुत्स्थ-वंशी, पूर्ण पुरुष, कौसल्या-नंदन, रघुश्रेष्ठ —
पद 25
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः। जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः॥२३॥
वेदांत से जाने जाने वाले, यज्ञों के स्वामी, सनातन पुरुषोत्तम, जानकी के प्रिय, श्रीमान और अपार पराक्रम वाले —
पद 26
इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः। अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः॥२४॥
(शिव जी कहते हैं) मेरा जो भक्त श्रद्धा से इन नामों का रोज़ जप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य पाता है, इसमें संदेह नहीं।
पद 27
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम्। स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः॥२५॥
दूब घास जैसे श्याम, कमल-नयन, पीतांबर पहने राम की जो दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे फिर संसार के बंधन में नहीं रहते।
पद 28
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्। राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिं वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्॥२६॥
लक्ष्मण के बड़े भाई, रघुश्रेष्ठ, सीतापति, सुंदर, ककुत्स्थ-वंशी, करुणा के सागर, गुणों के भंडार, विद्वानों के प्रिय, धर्मात्मा, राजाओं के राजा, सत्य पर अटल, दशरथ-पुत्र, श्याम, शांत स्वरूप, जगत को आनंद देने वाले, रघुकुल के तिलक, रावण के शत्रु राघव को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 29
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥२७॥
राम, रामभद्र, रामचंद्र, सृष्टिकर्ता, रघुनाथ, सबके स्वामी और सीता के पति को नमस्कार है।
पद 30
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम। श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम॥२८॥
हे श्रीराम, हे रघुनंदन, हे भरत के बड़े भाई, हे युद्ध में कठोर पराक्रमी राम — आप मेरी शरण बनिए।
पद 31
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि। श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये॥२९॥
मैं श्री रामचंद्र के चरणों को मन से याद करता हूँ, वाणी से उनका गुणगान करता हूँ, सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ और उन्हीं की शरण लेता हूँ।
पद 32
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर् नान्यं जाने नैव जाने न जाने॥३०॥
राम मेरी माता हैं, रामचंद्र मेरे पिता हैं, राम मेरे स्वामी और रामचंद्र मेरे मित्र हैं। दयालु रामचंद्र ही मेरा सब कुछ हैं — मैं किसी और को नहीं जानता, बिल्कुल नहीं जानता।
पद 33
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्॥३१॥
जिनके दाईं ओर लक्ष्मण, बाईं ओर जनक-पुत्री सीता और सामने हनुमान जी हैं, उन रघुनंदन को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 34
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥३२॥
जगत को आनंद देने वाले, युद्धभूमि में धीर, कमल-नयन, रघुवंश के स्वामी, करुणा के रूप और करुणा के भंडार श्री रामचंद्र की मैं शरण लेता हूँ।
पद 35
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥३३॥
मन जैसी गति और वायु जैसे वेग वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवन-पुत्र, वानर सेना के प्रमुख, श्रीराम के दूत हनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।
पद 36
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्। आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्॥३४॥
कविता रूपी डाली पर बैठकर 'राम-राम' के मीठे अक्षर मधुर स्वर में गाने वाली कोयल — महर्षि वाल्मीकि — को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 37
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्। लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥३५॥
विपत्तियों को दूर करने वाले, सब संपदाएँ देने वाले, जगत को आनंद देने वाले श्रीराम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।
पद 38
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम्। तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्॥३६॥
'राम-राम' का ज़ोर से उच्चारण संसार-बंधन के बीजों को भून देता है, सुख-संपदा लाता है और यम के दूतों को डराकर भगा देता है।
पद 39
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः। रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर॥३७॥
राजाओं में मणि जैसे राम सदा विजयी हैं; मैं लक्ष्मीपति राम को भजता हूँ। राम ने राक्षसों की सेना का नाश किया, उन राम को नमस्कार है। राम से बढ़कर कोई सहारा नहीं, मैं राम का दास हूँ। मेरा मन सदा राम में लीन रहे — हे राम, मेरा उद्धार कीजिए।
पद 40
श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥३८॥
(शिव जी पार्वती से कहते हैं) हे सुंदरी, मैं 'राम राम राम' जपकर मनोहर राम में ही रमता हूँ। एक राम-नाम विष्णु के हज़ार नामों के बराबर है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राम रक्षा स्तोत्र किसने लिखा?
इसे बुधकौशिक ऋषि ने लिखा। स्तोत्र के 15वें श्लोक के अनुसार भगवान शिव ने स्वप्न में इसे बताया था और ऋषि ने सुबह जागकर लिख दिया।
राम रक्षा स्तोत्र का पाठ कब और कितनी बार करें?
परंपरा से इसे सुबह स्नान के बाद या शाम को एक बार पढ़ा जाता है। कई परिवारों में बच्चे इसे रोज़ शाम दीप जलाकर पढ़ते हैं। रामनवमी और नवरात्रि में इसका विशेष पाठ होता है।
इसे 'रक्षा' स्तोत्र क्यों कहते हैं?
इसमें श्रीराम के अलग-अलग नामों से सिर से पैर तक शरीर के हर अंग की रक्षा की प्रार्थना है। इसे 'वज्रपंजर' यानी हीरे जैसा कवच भी कहा गया है। भक्त मानते हैं कि यह मन को निडर बनाता है।