राम चालीसा — अर्थ सहित
श्री राम चालीसा भगवान श्रीराम की स्तुति है, जो 'श्री रघुबीर भक्त हितकारी' से शुरू होती है। इसमें राम नाम की महिमा, हनुमान, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और माता सीता का गुणगान है। अंतिम पंक्तियों में हरिदास का नाम आता है। राम नवमी और किसी भी दिन, विशेषकर सात दिन नियम से, इसका पाठ किया जाता है।
॥ चौपाई ॥
श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
॥ चौपाई ॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥
॥ चौपाई ॥
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करो सन्तन प्रतिपाला॥
॥ चौपाई ॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना॥
॥ चौपाई ॥
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
॥ चौपाई ॥
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं। दीनन के हो सदा सहाई॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
॥ चौपाई ॥
चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
॥ चौपाई ॥
गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥
॥ चौपाई ॥
नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥
॥ चौपाई ॥
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
॥ चौपाई ॥
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों॥
॥ चौपाई ॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥
॥ चौपाई ॥
फूल समान रहत सो भारा। पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥
॥ चौपाई ॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुँ न रण में हारो॥
॥ चौपाई ॥
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
॥ चौपाई ॥
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥
॥ चौपाई ॥
ताते रण जीते नहिं कोई। युद्ध जुरे यमहूँ किन होई॥
॥ चौपाई ॥
महा लक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥
॥ चौपाई ॥
सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
॥ चौपाई ॥
घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥
॥ चौपाई ॥
सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
॥ चौपाई ॥
सिद्धि अठारह मंगल कारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥
॥ चौपाई ॥
औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
॥ चौपाई ॥
इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥
॥ चौपाई ॥
जो तुम्हरे चरनन चित लावै। ताको मुक्ति अवसि हो जावै॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
॥ चौपाई ॥
तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
॥ चौपाई ॥
जो कुछ हो सो तुमहीं राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
॥ चौपाई ॥
रामा आत्मा पोषण हारे। जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥
॥ चौपाई ॥
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
॥ चौपाई ॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥
॥ चौपाई ॥
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं॥
॥ चौपाई ॥
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥
॥ चौपाई ॥
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥
॥ चौपाई ॥
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
॥ चौपाई ॥
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुमहीं हो हमरे तन मन धन॥
॥ चौपाई ॥
याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
॥ चौपाई ॥
आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिव मेरा॥
॥ चौपाई ॥
और आस मन में जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
॥ चौपाई ॥
साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्धता पावै॥
॥ चौपाई ॥
अन्त समय रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
॥ चौपाई ॥
श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥
॥ दोहा ॥
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय। हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
॥ दोहा ॥
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय। जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
अर्थ
चौपाई 1
श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
हे भक्तों का भला करने वाले श्री रघुवीर, हे प्रभु, हमारी प्रार्थना सुन लीजिए।
चौपाई 2
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥
जो दिन-रात आपका ध्यान करता है, उसके समान कोई दूसरा भक्त नहीं है।
चौपाई 3
ध्यान धरे शिवजी मन माहीं। ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं॥
शिव जी अपने मन में आपका ध्यान करते हैं; ब्रह्मा और इंद्र भी आपका अंत नहीं पाते।
चौपाई 4
जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करो सन्तन प्रतिपाला॥
हे कृपालु रघुनाथ, आपकी जय हो; आप सदा संतों की रक्षा करते हैं।
चौपाई 5
दूत तुम्हार वीर हनुमाना। जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना॥
वीर हनुमान आपके दूत हैं, जिनका प्रभाव तीनों लोक जानते हैं।
चौपाई 6
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला। रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
हे कृपालु, आपकी भुजाएँ बहुत बलशाली हैं; आपने रावण को मारकर देवताओं की रक्षा की।
चौपाई 7
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं। दीनन के हो सदा सहाई॥
हे स्वामी, आप बेसहारों के सहारा हैं और सदा दीनों की सहायता करते हैं।
चौपाई 8
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं। सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
ब्रह्मा आदि भी आपका पार नहीं पाते, और शिव सदा आपका यश गाते हैं।
चौपाई 9
चारिउ वेद भरत हैं साखी। तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
चारों वेद गवाही देते हैं कि आपने सदा भक्तों की लाज रखी है।
चौपाई 10
गुण गावत शारद मन माहीं। सुरपति ताको पार न पाहीं॥
सरस्वती मन ही मन आपके गुण गाती हैं; देवराज इंद्र भी उनका पार नहीं पाते।
चौपाई 11
नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहिं होई॥
जो कोई आपका नाम लेता है, उसके समान धन्य कोई नहीं।
चौपाई 12
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
राम नाम की महिमा अपार है, जिसे चारों वेदों ने पुकार-पुकारकर गाया है।
चौपाई 13
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों। तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों॥
गणेश जी ने आपका नाम लिया, और आपने उन्हें प्रथम पूज्य बना दिया।
चौपाई 14
शेष रटत नित नाम तुम्हारा। महि को भार शीश पर धारा॥
शेषनाग रोज़ आपका नाम रटते हैं और धरती का भार अपने सिर पर उठाए रहते हैं।
चौपाई 15
फूल समान रहत सो भारा। पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥
आपके नाम से वह भारी बोझ उन्हें फूल जैसा हल्का लगता है; आपका पार कोई नहीं पा सकता।
चौपाई 16
भरत नाम तुम्हरो उर धारो। तासों कबहुँ न रण में हारो॥
भरत ने आपका नाम हृदय में धारण किया, इसलिए वे कभी युद्ध में नहीं हारे।
चौपाई 17
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा। सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
शत्रुघ्न के हृदय में आपका नाम प्रकाशित है, जिसके स्मरण से शत्रुओं का नाश होता है।
चौपाई 18
लषन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥
लक्ष्मण आपके आज्ञाकारी हैं और सदा संतों की रखवाली करते हैं।
चौपाई 19
ताते रण जीते नहिं कोई। युद्ध जुरे यमहूँ किन होई॥
इसलिए युद्ध में उन्हें कोई नहीं जीत सकता, चाहे सामने स्वयं यमराज ही क्यों न हों।
चौपाई 20
महा लक्ष्मी धर अवतारा। सब विधि करत पाप को छारा॥
महालक्ष्मी ने (सीता के रूप में) अवतार लिया, जो हर तरह से पापों को भस्म कर देती हैं।
चौपाई 21
सीता राम पुनीता गायो। भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
पवित्र सीता-राम का गुणगान हुआ, और सीता ने जगत की स्वामिनी भुवनेश्वरी के रूप में अपना प्रभाव दिखाया।
चौपाई 22
घट सों प्रकट भई सो आई। जाको देखत चन्द्र लजाई॥
वे धरती में से एक घड़े से प्रकट हुईं; उनकी सुंदरता देखकर चंद्रमा भी लजा जाता है।
चौपाई 23
सो तुमरे नित पांव पलोटत। नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
वही सीता रोज़ आपके चरण दबाती हैं, और नौ निधियाँ आपके चरणों में लोटती हैं।
चौपाई 24
सिद्धि अठारह मंगल कारी। सो तुम पर जावै बलिहारी॥
अठारह मंगलकारी सिद्धियाँ भी आप पर न्योछावर हैं।
चौपाई 25
औरहु जो अनेक प्रभुताई। सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
और जितनी भी महिमाएँ हैं, हे सीतापति, वे सब आपने ही रची हैं।
चौपाई 26
इच्छा ते कोटिन संसारा। रचत न लागत पल की बारा॥
आपकी इच्छा से करोड़ों संसार बनने में एक पल भी नहीं लगता।
चौपाई 27
जो तुम्हरे चरनन चित लावै। ताको मुक्ति अवसि हो जावै॥
जो आपके चरणों में मन लगाता है, उसे निश्चय ही मुक्ति मिलती है।
चौपाई 28
सुनहु राम तुम तात हमारे। तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
हे राम, सुनिए — आप ही हमारे पिता हैं; आपको ही भरत के वंश में पूज्य माना गया है।
चौपाई 29
तुमहिं देव कुल देव हमारे। तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
आप ही हमारे देवता और कुलदेवता हैं; आप ही गुरु और प्राणों से प्यारे देव हैं।
चौपाई 30
जो कुछ हो सो तुमहीं राजा। जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
हे राजा, जो कुछ है, आप ही हैं; हे प्रभु, आपकी जय हो, हमारी लाज रखिए।
चौपाई 31
रामा आत्मा पोषण हारे। जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
हे राम, आप आत्मा का पोषण करने वाले हैं; हे दशरथ के प्यारे, आपकी जय हो।
चौपाई 32
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा। निर्गुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा॥
हे ज्योति-स्वरूप प्रभु, आपकी जय हो; आप निर्गुण ब्रह्म, अखंड और अनुपम हैं।
चौपाई 33
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
हे सत्य का व्रत रखने वाले स्वामी, आपकी जय हो; आप सत्य, सनातन और सबके मन की जानने वाले हैं।
चौपाई 34
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥
जो सच्चे मन से आपका भजन गाता है, वह जीवन के चारों फल — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 35
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं। तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं॥
गौरीपति शिव ने सच्ची शपथ लेकर कहा है कि आपने भक्तों को सब सिद्धियाँ दी हैं।
चौपाई 36
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा। नमो नमो जय जगपति भूपा॥
हे ज्ञान-स्वरूप, मेरे हृदय में ज्ञान दीजिए; हे जगत के स्वामी राजा, आपको बार-बार प्रणाम।
चौपाई 37
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा। नाम तुम्हार हरत संतापा॥
आप धन्य हैं, आपका प्रताप धन्य है; आपका नाम सब दुख हर लेता है।
चौपाई 38
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया। बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
देवताओं ने आपके सत्य और पवित्र रूप का गान किया, नगाड़े बजे और शंख बजाए गए।
चौपाई 39
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन। तुमहीं हो हमरे तन मन धन॥
आप ही सत्य हैं, सनातन सत्य; आप ही हमारे तन, मन और धन हैं।
चौपाई 40
याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
जो कोई इसका पाठ करता है, उसके हृदय में ज्ञान प्रकट होता है — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 41
आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिव मेरा॥
उसका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है; इसे सत्य वचन मानो, ऐसा शिव जी कहते हैं।
चौपाई 42
और आस मन में जो ल्यावै। तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
जो मन में कोई और कामना लेकर आए, वह तुलसी के पत्ते और फूल चढ़ाए,
चौपाई 43
साग पत्र सो भोग लगावै। सो नर सकल सिद्धता पावै॥
और सादे साग-पत्तों का भोग लगाए; ऐसा व्यक्ति सब कामों में सफलता पाता है — ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 44
अन्त समय रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
अंत समय में वह रघुवीर के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।
चौपाई 45
श्री हरिदास कहै अरु गावै। सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥
हरिदास कहते हैं: जो इसे कहता और गाता है, वह वैकुंठ धाम पाता है।
दोहा
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय। हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
हरिदास कहते हैं: जो सात दिन नियम से मन लगाकर पाठ करे, वह हरि की कृपा से निश्चय ही भक्ति पाता है।
दोहा
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय। जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
जो राम के चरणों में मन लगाकर राम चालीसा पढ़ता है, उसकी मन की इच्छाएँ पूरी होती हैं — ऐसा यह दोहा कहता है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राम चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। राम नवमी, दिवाली, विवाह पंचमी और हर गुरुवार या मंगलवार को भी कई भक्त इसका पाठ करते हैं। सुबह स्नान के बाद राम दरबार के सामने दीप जलाकर पढ़ना अच्छा माना जाता है।
राम चालीसा कितने दिन पढ़ें?
चालीसा के अंतिम दोहे में सात दिन नियम से पाठ करने की बात कही गई है, इसलिए कई भक्त सात दिन का संकल्प लेते हैं। रोज़ एक बार प्रेम से पढ़ना भी पर्याप्त है।
राम चालीसा पढ़ने से क्या लाभ माना जाता है?
भक्तों का विश्वास है कि राम नाम का स्मरण मन को शांत और निर्मल करता है, और श्रद्धा से पाठ करने पर भक्ति बढ़ती है। चालीसा यह भी सिखाती है कि भगवान तुलसी-दल और साग जैसी सादी भेंट को भी प्रेम से स्वीकार करते हैं।